कनहर मामले में एक कदम नहीं बढ़े, सिर्फ एफिडेविट का हो रहा एक्सचेंज : हाइकोर्ट
रांची : झारखंड हाइकोर्ट ने शुक्रवार को गढ़वा में कनहर नदी पर बराज निर्माण को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र व राज्य सरकार को निर्देश दिया. एक्टिंग चीफ जस्टिस हरीश चंद्र मिश्र व जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए केंद्रीय वन, पर्यावरण व क्लाइमेट चेंज मंत्रालय व राज्य सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग को प्रतिवादी बनाया. फॉरेस्ट व पर्यावरण क्लियरेंस के मामले में जवाब देने का निर्देश दिया.
जल संसाधन, वन मंत्रालय व राज्य के वन एवं पर्यावरण विभाग को नोडल अॉफिसर नियुक्त कर अगली सुनवाई के दाैरान नाम बताने का निर्देश दिया. खंडपीठ ने माैखिक रूप से कहा कि दुख की बात है कि वर्ष 2009 से जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही है. लेकिन कनहर बराज बनाने में एक कदम आगे नहीं बढ़ा गया. इस दाैरान सिर्फ एफिडेविट का एक्सचेंज होता रहा.
27 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
खंडपीठ ने सरकार को बराज निर्माण के शिलान्यास की तिथि बताने को कहा. मामले की अगली सुनवाई के लिए खंडपीठ ने 27 सितंबर की तिथि निर्धारित की. इससे पूर्व प्रार्थी की अोर से अधिवक्ता महेश तिवारी ने खंडपीठ को बताया कि झारखंड बनने के बाद से अब तक बराज निर्माण की दिशा में सरकार एक कदम भी नहीं बढ़ा पायी है.
1969 से बराज पर काम चल रहा है. 50 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो गये हैं, लेकिन बराज नहीं बना. झारखंड गठन के 19 साल में गढ़वा-पलामू क्षेत्र को 12 बार सूखाग्रस्त माना गया है. राज्य सरकार की अोर से अधिवक्ता अतानु बनर्जी ने बताया कि अप्रैल माह में फॉरेस्ट-पर्यावरण क्लियरेंस के लिए भेजा गया है. कोई जवाब नहीं मिला है.
केंद्र सरकार की अोर से अधिवक्ता राजीव सिन्हा व अधिवक्ता नीरज कुमार ने पक्ष रखा. उल्लेखनीय है कि प्रार्थी पूर्व मंत्री हेमेंद्र प्रताप देहाती ने जनहित याचिका दायर कर कनहर नदी पर बराज निर्माण की मांग की है. इस मामले में कोर्ट के आदेश पर उच्चस्तरीय समिति का भी गठन किया गया था.
इतिहास-नागरिक शास्त्र विषय में नियुक्ति की याचिकाएं खारिज
रांची : पीजीटी व स्नातक प्रशिक्षित हाइस्कूल शिक्षक प्रतियोगिता परीक्षा के इतिहास-नागरिक शास्त्र विषय को लेकर दायर याचिकाएं खारिज हो गयी हैं. शुक्रवार को झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस डॉ एसएन पाठक की अदालत ने फैसला सुनाते हुए याचिकाअों को खारिज कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप इतिहास-नागरिक शास्त्र विषय की अर्हता रखनेवाले अभ्यर्थी योग्य माने जायेंगे. 25 जुलाई 2019 को सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की अोर से अधिवक्ता संजय पिपरवाल, अधिवक्ता राकेश रंजन व अधिवक्ता प्रिंस कुमार उपस्थित थे. उन्होंने फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि अदालत ने प्रार्थियों की दलील को स्वीकार नहीं किया. याचिका खारिज होने के साथ ही 17 जिलों के इतिहास विषय का रिजल्ट निकालने पर लगी रोक भी हट गयी है. उधर पूर्व में सुनवाई के दाैरान प्रार्थी की अोर से बताया गया था कि प्राचीन, मध्य कालीन या आधुनिक इतिहास पढ़ कर डिग्री लेनेवाले भी इतिहास से स्नातक व स्नातकोत्तर है.
कर्मचारी चयन आयोग के विज्ञापन में इतिहास विषय का जिक्र है. उनकी उम्मीदवारी को आयोग द्वारा रद्द किया जाना उचित नहीं है. पूर्व में सुनवाई के दाैरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की अोर से अदालत में पत्र प्रस्तुत कर बताया गया था कि वह डिग्री की समकक्षता तय नहीं करता है. यह कार्य सरकार या विश्वविद्यालयों का है.
उल्लेखनीय है कि प्रार्थी संतोष कुमार यादव, अशोक कुमार द्विवेदी, राजीव मणि त्रिपाठी, संजय कुमार, दिनेश कुमार यादव, मनोज कुमार, तबरेज आलम, मनीष कुमार, लक्ष्मीकांत त्रिपाठी की अोर से अलग-अलग याचिका दायर की थी. उन्होंने पीजीटी के विज्ञापन संख्या 10/2017 व हाइस्कूल शिक्षक के विज्ञापन संख्या 21/2016 की शर्तों को चुनाैती दी थी.
कोर्ट फीस स्टांप की कमी मामले में जवाब दे सरकार
रांची : हाइकोर्ट ने शुक्रवार को कोर्ट फीस स्टांप की कमी को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से जवाब मांगा है. एक्टिंग चीफ जस्टिस हरीश चंद्र मिश्र व जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने सरकार से कहा कि इंस्ट्रक्शन लेकर कोर्ट को अवगत करायें कि स्टांप क्यों नहीं मिल रहा है.
अगली सुनवाई 26 सितंबर को हाेगी. इससे पूर्व प्रार्थी की अोर से अधिवक्ता रितु कुमार ने पैरवी की. प्रार्थी अधिवक्ता लिपिक संघ झारखंड हाइकोर्ट के अध्यक्ष डीसी मंडल ने याचिका में कहा है कि एक रुपये, दो, पांच व 10 रुपये का कोर्ट फीस स्टांप कई माह से नहीं है. 20 व 200 रुपये का स्टांप उपलब्ध है.
फाइलिंग हो या नकल निकालना हो सभी में अधिक मूल्य के स्टांप से काम चलाना पड़ रहा है. इसके चलते लोगों को अनावश्यक रूप से अधिक पैसा चुकाना पड़ रहा है. पूर्व में वर्ष 2006 में हाइकोर्ट ने जनहित याचिका की सुनवाई के दाैरान सरकार को आदेश दिया था कि भविष्य में राज्य में स्टांप की किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए.
