- पी-पेशा एक्ट आदिवासी-मूलवासी की जरूरत
- सरकार इसके खिलाफ नीतियां बना रही है
रांची : झामुमो ने पांचवीं अनुसूची के तहत राज्य में पेशा एक्ट लागू करने की मांग की है़ पार्टी के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य में पी-पेशा एक्ट के खिलाफ नीतियां बन रही है़ं रोजगार व स्थानीय नीति इस कानून के खिलाफ है़ राज्य में 1985 का कट ऑफ डेट तय करने का मामला हो या फिर भूमि अधिग्रहण नीति इस कानून के विपरीत काम हो रहा है़
पी-पेशा एक्ट राज्य के आदिवासी-मूलवासी की जरूरत है़ इसे जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए़ श्री भट्टाचार्य शुक्रवार को पार्टी कार्यालय में पत्रकारों से बात कर रहे थे़ उन्होंने कहा कि पिछले दिनों राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने पेशा एक्ट को लेकर बैठक की़ झारखंड पांचवीं अनुसूची का राज्य है़ वर्ष 1996 में यह कानून संसद से बना़ राज्यों को एक वर्ष के अंदर अपनी नियमावली बनानी थी.
राज्य गठन के 18 वर्ष गुजर गये, लेकिन कानून नहीं बन पाया़ झामुमो इस मुद्दे पर शिबू सोरेन के नेतृत्व में राष्ट्रपति और राज्यपाल से मिल कर कानून काे लागू करने की मांग करता रहा है़ पेशा एक्ट लागू नहीं किये जाने से राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना प्रभावित हो रही है़ ग्राम सभा को दरकिनार कर भूमि अधिग्रहण जैसे काम हो रहे है़ं पांचवीं अनुसूची की पारंपरिक व्यवस्था जैसे मानकी मुंडा, पाहन, डोकलो सोहोर जैसी व्यवस्था पर आघात किया जा रहा है़
श्री भट्टाचार्य ने कहा कि समाज को संवैधानिक संरक्षण देने वाले कानून को लागू किया जाना चाहिए़ राज्यपाल को अधिकार है कि वह पांचवीं अनुसूची के खिलाफ बनने वाले कानून को रद्द कर सकती है़ं झामुमो नेता ने कहा कि राज्य सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रहा है़ चुनाव आनेवाला है, तो जनजातीय समाज मेें भ्रम फैलाया जा रहा है़
शहीदों की धरोहर की रक्षा नहीं कर पा रही सरकार
श्री भट्टाचार्य ने राजधानी के बिरसा मुंडा समाधि स्थल पर बिरसा मुंडा की प्रतिमा क्षतिग्रस्त किये जाने की निंदा करते हुए कहा कि धरती आबा की प्रतिमा को तोड़ कर झारखंडी भावना को आघात पहुंचाने का काम किया गया है़ यह सबकुछ प्रशासनिक विफलता की देन है़ एक दिन पहले रात में ही प्रतिमा क्षतिग्रस्त की गयी, लेकिन अधिकारियों को पता नहीं लगा़
राज्य सरकार शहीदों के सम्मान व धरोहर की रक्षा नहीं कर पा रही है़ झारखंड की भावना पर लगातार हमले हो रहे है़ं शैक्षणिक संस्थान, स्कीम या फिर रोजगार मेला हो इनका नामकरण झारखंडी भावना के विपरीत हो रहा है़
