रांची : आम जनता के प्रतिनिधि को ईमानदार, सरल व संवेदनशील होना चाहिए. पढ़ा-लिखा भी हो, ताकि पार्लियामेंट में जनता की आवाज को बुलंद कर सके. सांसद वैसा होना चाहिए, जिनका जीवन त्यागमय व पवित्र हृदय का हो. वैसे व्यक्ति को सांसद चुनना चाहिए, जिससे हमारे देश का भविष्य उज्जवल हो सके.
देश मजबूत हो सके. केवल छवि से नहीं, बल्कि हृदय से शुद्ध हो तथा समाज की सेवा करने में हमेशा तत्पर रहता हो. उसे धन के प्रति लालसा नहीं हो. वह क्षेत्र व लोगों की समस्याअों को दूर करे. हमेशा लोगों के सुख-दु:ख में खड़ा रहे. वोट मांगने के लिए हमेशा जनता के बीच रहनेवाला उम्मीदवार निर्वाचित होने के बाद भी जनता के बीच में रहे. नजर आये. अब तो यह फैशन हो गया है कि पार्टी या उम्मीदवार लोगों से वादा करते हैं. हाथ जोड़ कर वोट मांगते हैं. जितने के बाद क्षेत्र में नजर तक नहीं आते हैं. अपने कोटे का सही उपयोग नहीं करते हैं, वैसे उम्मीदवारों को संसद भेजने की जरूरत नहीं है.
पीसी त्रिपाठी, झारखंड हाइकोर्ट के वरीय अधिवक्ता व बार काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष. (राज्य में सबसे अधिक 55 वर्षों से प्रैक्टिस कर रहे हैं. उनके बड़े भाई एसएन त्रिपाठी अधिवक्ता व पलामू के विधायक थे.)
ससुर के लिए तीर-धनुष लेकर खड़े हैं दामाद
ससुर-दामाद को लेकर झारखंड की एक सीट हॉट सीट बनती जा रही है. ससुर जी को टिकट दिलाने के लिए दामाद जी पूरा जोर लगा रहे हैं. ससुर जी पुराने नेता हैं. संयोग से इस बार विधायक नहीं बन पाये हैं.
पर दामाद जी जो कि अभी विधायक भी हैं. दावा कर रहे हैं कि ससुर जी को तो जीता ही देंगे. वह लगे हैं ससुर जी के लिए टिकट की जुगाड़ में. हाथों में तीर-धनुष लेकर दोनों ससुर-दामाद घूम रहे हैं. पर मुश्किल ये है कि तीर-धनुष लेकर पार्टी के एक और विधायक तैनात हैं.
अब दोनों तरफ से तीर-धनुष तन गया है. पार्टी परेशान है. दोनों पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, किसे टिकट दें किसे न दें. इधर बड़ी पार्टी के एक बड़े चचा साइडलाइन कर दिये गये हैं. जिसके कारण तीर-धनुष के दोनों उम्मीदवारों को लग रहा है कि इस बार टिकट मिला, तो जीत पक्की. अब इनके भाग्य का फैसला तो गुरु दरबार में ही होगा. फिलहाल गुरु दरबार गठबंधन की पेंच सुलझाने में लगा है.
