नामकुम : सामाजिक संस्था युगांतर भारती तथा नेचर फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित पर्यावरण पाठशाला का उदघाटन शनिवार को हुआ. इस कार्यक्रम में राज्य भर से पर्यावरणविद् तथा हर जिले से दो-दो सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं.
निर्णय लिया गया कि पाठशाला के माध्यम से वायु प्रदूषण से जूझ रहे क्षेत्रों में जन आंदोलन खड़ा कर उसके दुष्प्रभाव से आमजनों को जागरूक करने का काम किया जायेगा. रक्षा शक्ति विवि के प्रोफेसर डॉ अभिजीत घोष ने प्रतिभागियों को झूम खेती के दुष्प्रभावों तथा पर्यावरण व इससे जुड़ी जानकारी दी.
हम किस तरह अपने आसपास उपलब्ध संसाधनों से वायु प्रदूषण की मात्रा को जांच सकते हैं व नमूने संग्रहित कर सकते हैं, इसकी भी जानकारी दी गयी. कार्यक्रम का संचालन युगांतर भारती के सचिव आशीष शीतल तथा धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष मधु ने किया. कार्यक्रम के दौरान अंशुल शरण, उमेश दास, वंदना सुरेन, बजरंग कुमार, माधुरी सिन्हा, साइमा अफरीन, ब्रजेश कुमार शर्मा, संतोष कुमार, मुकेश कुमार, मुकेश सिंह, अंगद मुंडा, पुष्पा टोप्पो, अनिल कुजूर, रेखा देवी आदि की भूमिका रही.
इन तरीकों से जान सकेंगे प्रदूषण की मात्रा
पेड़ों पर उगनेवाले परजीवी (लाइकन्स) ने अगर रंग बदल लिया है, तो इसका मतलब है कि वहां सल्फर डाइअॉक्साइड की मात्रा मानक स्तर से काफी उच्च है. अगर यह पेड़ों पर नहीं पाया जाता है, तो इसका मतलब है कि सल्फर डाइअॉक्साइड की मात्रा खतरनाक लेवल तक पहुंच गया है.
पेड़ों के पत्तों को अगर नीचे झुका हुआ पायेंगे, तो इसका मतलब है कि वहां पर धूल कणों की मात्रा अधिक है और यह खतरनाक स्तर पर है. और पत्ते आधे सूखे हुए हों, तो प्रदूषण ज्यादा है.
कागज पर गोंद लगाकर ऊंचाइयों पर रखें. एक तय समय सीमा के बाद पायेंगे कि जो धूलकण वायु में घुले-मिले हुए हैं, कागज में सट जायेंगे. उसे बाद में उसका भार लेकर देखा जा सकता है कि वजन कितना बढ़ा हुआ है.
पेड़ के पत्तों को साफ कर अलग-अलग समय में अध्ययन करेंगे, तो पायेंगे कि वायु गुणवत्ता का भार कितना है.पीएम 2.5 की मात्रा बढ़ने से सांस फूलना, गले में कफ जमा होना व छाती में दर्द तथा थकान आदि होना दर्शाता है कि वायु में धूलकण की मात्रा खतरनाक स्तर पर है.
वायु में खतरनाक गैस की मात्रा बढ़ने से हृदय रोग बढ़ जाता है. साथ ही कैंसर की बीमारी को भी जन्म देता है.
