सुनील चौधरी, रांची : झारखंड बिजली वितरण निगम को इस वर्ष भी 2789.17 करोड़ रुपये का घाटा होगा. वितरण निगम लगातार घाटे में डूबता जा रहा है. वितरण निगम ने अपनी टैरिफ पिटीशन में वित्तीय वर्ष 2018-19 में 2789.17 करोड़ रुपये के घाटे अनुमान लगाया है और झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग से घाटा पाटने के लिए ही टैरिफ में बढ़ोतरी करने की मांग की है.
वितरण निगम द्वारा इस वर्ष घरेलू उपभोक्ताओं की दरों में 50 पैसे से लेकर 1.60 पैसे प्रति यूनिट तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया है. वितरण निगम द्वारा आयोग को सौंपे गये टैरिफ प्रस्ताव में वित्तीय वर्ष 2018-19 में अनुमानित खर्च का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि ग्रॉस एनुअल रेवेन्यू रिक्वायरमेंट(एआरआर) 7577.52 करोड़ का है, जबकि बिजली बेचने पर केवल 4788.36 करोड़ रुपये ही मिलेंगे. यानी 2789.17 करोड़ रुपये का रेवेन्यू गैप होगा, जो घाटा है.
कहा गया कि है कि इसमें केवल बिजली खरीद पर 5740.18 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इसमें ट्रांसमिशन चार्ज 216.95 करोड़, अॉपरेशन एंड मेंटेनेंस पर 465.01 करोड़, डिप्रेसियेएशन पर 316.72 करोड़, ऋण पर ब्याज में 205.82 करोड़, इक्विटी पर रिटर्न में 196.40 करोड़, वर्किंग कैपिटल पर ब्याज में 33.87 करोड़, सिक्योरिटी डिपोजिट पर ब्याज में 46.22 करोड़, डाउटफुल डेब्ट पर 478.84 करोड़…यानी कुल 7577.52 करोड़ रुपये खर्च होंगे.
4788 करोड़ ही आयेंगे : निगम के पिटीशन में कहा गया है कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में कुल 5740 करोड़ रुपये सिर्फ बिजली खरीदने पर खर्च होंगे, जबकि बिजली बेचने के बाद वसूली केवल 4788.36 करोड़ रुपये की होगी. यानी केवल बिजली खरीद कर इसे बेचने में भी 952 करोड़ रुपये का घाटा होगा. वितरण निगम द्वारा इस घाटे का हवाला देते हुए वित्तीय वर्ष 2019-20 की टैरिफ बढ़ाने पर 8375.24 करोड़ रुपये के एआरआर को स्वीकृत करने की मांग की गयी है. ताकि घाटा का गैप कम हो सके.
हर वर्ष निगम को होता रहा है घाटा : झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड का बंटवारा कर जब चार कंपनियां बनायी गयी थी, तब जीरो बैलेंस पर कंपनियां बनी थी. इनमें ही एक कंपनी झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड बनी. पर बंटवारे के बाद भी कंपनी घाटे में चली गयी. कंपनी 2016 से लेकर अबतक लगातार घाटे में चल रही है.
वितरण निगम पर 6627.80 करोड़ का कर्ज
झारखंड राज्य बिजली वितरण निगम भारी कर्ज में डूब चुका है. इसका कर्ज बढ़कर 6627.80 करोड़ रुपये हो गया है. इसमें डीवीसी का बकाया 3527.80 करोड़ और टीवीएनएल का बकाया 3100 करोड़ हो गया है. जिस पर डीवीसी और तेनुघाट लगातार डिले पेमेंट सरचार्ज लगाता जा रहा है.
बिजली खरीद में 40 करोड़ की वृद्धि
वितरण निगम में इस वर्ष बिजली खरीद में 40 करोड़ की वृद्धि हुई है. निजी और सेंट्रल सेक्टर से हर दिन औसतन 2000 मेगावाट बिजली ली जाती है. दो साल पहले हर महीना करीब 360 करोड़ रुपये की बिजली खरीदी जाती थी. अब हर माह लगभग 400 करोड़ रुपये की बिजली खरीदी जा रही है.
बिलिंग कम, चोरी अधिक
वितरण निगम का इस समय एटीएंडडी लॉस 30% है. यानी 30% का घाटा होता है. वितरण निगम में घाटे की वजह बताते हुए एक अधिकारी ने बताया कि सबसे बड़ी वजह है कि शत प्रतिशत बिलिंग नहीं होती. लगभग 80% की ही बिलिंग होती है और इसमें भी 50 से 60% उपभोक्ताओं से ही वसूली हो पाती है. शेष एरियर में चला जाता है.
दूसरी वजह है कि लाख दावों के बावजूद बिजली की चोरी रुक नहीं रही है. इस चोरी में बड़ी कंपनियों से लेकर छोटे उपभोक्ता भी अकसर पकड़े जाते हैं. इसके अलावा ऊंची दर पर बिजली खरीद कर कम दर पर बेचना एक बड़ी वजह है. ग्रामीण इलाकों में भी बिना मीटरवालों को बिजली देना घाटे का एक कारण है.
ऊंची दर पर खरीदी जाती है बिजली
वितरण निगम के एक अधिकारी ने बताया कि घाटा की वजह है कि अधिक दर पर बिजली खरीदना. इसमें डीवीसी और एनटीपीसी की दर सबसे अधिक है.
हर वर्ष घाटा होता है बिजली वितरण निगम को
वर्ष 2016-17 2,531 करोड़
वर्ष 2017-18 1,115.93 करोड़
वर्ष 2018-19 2,789 करोड़
