सुदेश कुमार महतो
सबसे पहले स्वराज स्वाभिमान यात्रा के मकसद को सामने रखना चाहता हूं, ताकि ये न लगे कि इसकी जरूरत चुनावी आहटों के साथ हुई है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती से इसकी शुरुआत इस राह पर बढ़ने की हिम्मत जरूर देती रहेगी. इस यात्रा के जरिये हम और आप उन विषयों का मूल्यांकन कर सकते हैं, जिन्हें इस राज्य में मौके और वक्त के हिसाब से मोड़े जाते हैं, छोड़े जाते हैं या फिर थोपे जाते हैं. साथ ही झारखंडी विषयों पर बहस और विमर्श के रास्ते रोके जाते हैं.
इस यात्रा में आपकी भागीदारी से इन सवालों का जवाब भी तलाशा जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में शासन-प्रशासन और सियासत झारखंडी विचारधारा से दूरियां बनाता रहा और हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसकती रही.
इस यात्रा के साथ कुछ महत्वपूर्ण विषयों का मूल्यांकन भी बेहद जरूरी है. ये विषय स्वराज, सत्ता के विकेंद्रीकरण, विस्थापन, रोजगार, खनिज संपदा के दोहन, अधिकार और भाषा, संस्कृृति, परंपरा की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा और स्वाभिमान से जुड़े हैं.
ेस्वाभिमान : झारखंड जिस दौर से गुजर रहा है उसमें यहां के किसान, मजदूर, महिला और छात्र की आवाज क्या है, उनके विचार क्या हैं, इसे जानने-समझने की दरकार है. विस्थापन, पुनर्वास, रोजगार को लेकर उठते सवालों के जवाब भी उन्हीं के बीच से तलाशे जाने चाहिए.
भाषा, संस्कृृति और रोजगार : हम झारखंड आंदोलन के भागीदार रहने के साथ इसके भी गवाह रहे हैं कि बौद्धिक, सांस्कृृतिक गतिविधियां ही इस आंदोलन को धार देती थी. बिनोद बिहारी महतो, शहीद निर्मल महतो जैसी शख्सियतों से हमें लड़ने-पढ़ने और बढ़ने की ताकत मिलती रही है.
झारखंड की पहचान और अस्मिता बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू, चांद भैरव, वीर बुद्धू भगत, टिकैत उमरांव, शेख भिखारी, नीलांबर-पीताबंर जैसे वीर सपूतों से जुड़ी है. लेकिन बदलते दौर और सत्ता की बदलती प्राथमिकता में इंडैक्स रिपोर्ट और रैकिंग के शामिल होने से मूल और साझी विरासत, पंरपरा अलग थलग पड़ने लगी है. आबादी के लिहाज से झारखंड का पिछड़ा वर्ग 27 प्रतिशत आरक्षण का हकदार है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक तथा सेवा (नौकरियों) के फ्रंट पर यह आबादी अपेक्षित हक-अधिकार पाने से वंचित रही है.
सियासत की राह : 14 सालों तक झारखंड राज्य में स्थायी और बहुमत की सरकारें नहीं होने की कसक उठती रही है. स्थायी सरकार ही परिस्थितियां बदल सकती है, यह आम धारणा थी. छोटी हैसियत रखने के बाद भी हमारी पार्टी ने स्थायी सरकार की पहल की. अब इस सरकार के चार साल होने को हैं. जाहिर है सरकार जनता की कसौटी पर कितनी कसी हुई है, इसे परखने का वक्त है.
चुनावों की आहट के साथ मौजूदा राजनीति खास मकसद से खास जगह पर केंद्रित होती नजर आ रही है: उसे हटाओ, हमें बिठाओ. हमारी परिकल्पना में पूरा प्रदेश और यहां की सारी जनता है. जनता की भावना के अनुरूप क्षेत्रीय सवाल हमारे लिए सर्वोपरि हैं. जबकि राष्ट्रीय पार्टियां कभी क्षेत्रीय सवाल या स्थानीय जनता के विषयों के करीब नहीं होती. उनके अपने विषय होते हैं और अपने एजेंडे. राजनीति में हमारा कोई गॉड फादर नहीं है. हम किसी फैसले के लिए दिल्ली-पटना पर नहीं टिके होते हैं.
सरकारें आती–जाती रहेंगी, लेकिन झारखंड को संवारने के मौके इसी तरह गुजरते रहे, तो मंजिल कभी हासिल नहीं की जा सकती. साथ ही भेदभाव और दोषपूर्ण नीतियों को हम रोक नहीं सके, तो आने वाली पीढ़ियां इसका खामियाजा भुगतेगी. न्यू इंडिया और न्यू झारखंड के उदय वाली इस राजनीति में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को बचाना बेहद जरूरी है. इसी मकसद से यात्रा पर हम निकले हैं. आपकी बातें सुनने के लिए और अपनी कुछ कहने के लिए.
लेखक आजसू पार्टी के सुप्रीमो हैं
स्वराज के मायने
महात्मा गांधी के समग्र चिंतन और दर्शन के केंद्र गांव रहे. स्वराज की अवधारणा में उन्होंने तय किया कि तरक्की की कसौटी वह आम आदमी होगा, जो तमाम सुविधाओं से वंचित है. गांधी जयंती पर इस यात्रा की शुरुआत के साथ यह परखा जाना चाहिए कि स्वराज के मुकाम पर हम और हमारा राज्य झारखंड कहां खड़ा है.
स्वास्थ्य, बिजली, पानी, रोजगार, सड़क जैसी मूलभूत जरूरतें अब भी बड़ी समस्या के तौर पर गिनी और गिनायी जाती है. इसी कड़ी में झारखंड की धरती के क्रांतिवीर बिरसा मुंडा की सोच और हुंकार की चर्चा प्रासंगिक है, जिन्होंने अबुआ दिशुम अबुआ राज की मुनादी की थी. भौगोलिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, भाषाई दृृष्टिकोण से अलग राज्य हासिल करने के 18 साल हो गये.
स्वराज के बरक्स मौजूदा हालात पर गौर करें, तो तस्वीरें कुछ इस तरह की दिखाई पड़ेंगी कि आखिरी कतार में शामिल लोग थाना, ब्लॉक, अंचल में अपना कोई काम भयमुक्त होकर नहीं करा सकते. प्रक्रियाओं के बोझ तले न्यायोचित सेवाओं और लाभ से लोगों को वंचित किया जाता रहा है. हर सरकारी मुलाजिम की पहली प्राथमिकता आंकड़ों की बाजीगरी है. महज आय, जाति प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए महीनों चक्कर लगाने पड़ते हैं.
विस्थापन और पुनर्वास
जमीन की सुरक्षा और विस्थापन का सवाल इस राज्य को सबसे ज्यादा परेशान करता रहा है. दरअसल कल-कारखाने, औद्योगिक विस्तार का खामियाजा सबसे ज्यादा झारखंड के आदिवासी, मूलवासी ने भुगता है.
डीवीसी, बोकारो स्टील, एचइसी, बड़े डैम और खदानों के चलते विस्थापित परिवार सालों से इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं. राज्य में कम से कम डेढ़ लाख परिवार पुनर्वास के इंतजार में हैं. खेती की जमीन का अधिग्रहण होने से रोजगार के अवसर खत्म हो रहे हैं. जमीन की सुरक्षा की लड़ाई अलग राज्य गठन से दशकों पहले की रही है.
सत्ता का विकेंद्रीकरण : झारखंड में सत्ता का विकेंद्रीकरण बड़ा सवाल है. शहरी निकायों या पंचायत चुनावों भर से सत्ता के विकेंद्रीकरण की गारंटी नहीं दी जा सकती. ग्रामसभा और पारंपरिक व्यवस्था को कितनी मजबूती दी जा रही है, इस पर विचार मंथन किये जाने की जरूरत है.
ग्रामीण विकास मंत्री की जिम्मेदारी संभालते हुए मैंने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण के फैसले को मूर्त रूप दिया था. इसके सकारात्मक परिणाम भी आये, लेकिन वक्त के साथ ग्रामसभा और पंचायती राज व्यवस्था के सशक्तीकरण की प्रकियाओं को अमल में नहीं लाया गया.
गांव की पारंपरिक व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाये रखने की चुनौतियां हैं. इन दिनों राज्य में पंचायत समिति और ग्रामसभा के समानांतर कमेटियां गठित की जा रही हैं. उनके नाम पर विकास फंड आवंटित किये जा रहे हैं. इससे ग्राम स्वराज के ताने-बाने पर खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता.
