सुनील चौधरी
रांची : झारखंड बिजली वितरण निगम के 32 लाख में लगभग 16 लाख उपभोक्ता बिल का भुगतान नहीं करते हैं. बिजली बिल का बकाया इनके पास रह जाता है. झारखंड बिजली वितरण निगम 32 लाख में 85 प्रतिशत उपभोक्ताओं को बिल निर्गत करता है. इसमें औद्योगिक, कॉमर्शियल से लेकर घरेलू उपभोक्ता आदि शामिल हैं. पर इनमें अाधे उपभोक्ता बिजली बिल का भुगतान ही नहीं करते.
350 करोड़ का बिल बनता है : झारखंड बिजली वितरण निगम द्वारा हर माह लगभग 350 करोड़ रुपये का बिल निर्गत किया जाता है. इसमें वसूली 248 करोड़ रुपये की ही हो पाती है. शेष उपभोक्ता या तो बिल नहीं देते या उनके बिल में गड़बड़ी हो जाती है. इससे बिल लंबित रह जाता है.
हालांकि अनुमान था कि टैरिफ के बाद राजस्व बढ़ेगा. पर राजस्व में खास वृद्धि नहीं हुई है. राज्य सरकार इसके बदले में हर माह 53 करोड़ रुपये की सब्सिडी वितरण निगम को दे रही है. यानी बोर्ड को राजस्व के रूप में प्रतिमाह 301 करोड़ रुपये मिल रहे हैं. वितरण निगम हर माह 450 करोड़ रुपये की बिजली खरीदकर उपभोक्ताओं को आपूर्ति करता है.
टैरिफ बढ़ा फिर भी… : कुल 2150 मेगावाट बिजली हर दिन खरीदी जाती है. इसमें डीवीसी, एनटीपीसी, आधुनिक, इनलैंड पावर व अन्य कंपनियां शामिल हैं. इसके एवज में निगम के पास कुल 301 करोड़ रुपये ही आते हैं. वहीं निगम का स्थापना व्यय 21 करोड़ रुपये प्रतिमाह है. यानी नो प्रॉफिट नो लॉस में आने के लिए निगम को महीने में कम से कम 471 करोड़ रुपये की राजस्व की जरूरत होती है.
पर इसके बदले आते हैं केवल 301 करोड़ रुपये. निगम को हर माह 170 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. इसकी भरपाई भी अब नहीं हो सकती. निगम के एक अधिकारी ने कहा कि नियामक आयोग द्वारा जितनी टैरिफ की मांग की गयी थी, उतनी टैरिफ बढ़ायी ही नहीं गयी, इस कारण निगम को नुकसान उठाना पड़ रहा है. भविष्य में सौभाग्य योजना से सभी घरों में जब बिजली के कनेक्शन दे दिये जायेंगे तो उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर दोगुनी हो जायेगी. तब बिजली की मांग भी बढ़ेगी और खर्च भी.
1411 करोड़ सालाना का घाटा होगा
जेबीवीएनएल के हाल ही में स्वीकृत किये गये टैरिफ के पूर्व निगम ने नियामक आयोग से कुल 7385.40 करोड़ रुपये एग्रीगेट रेवन्यू रिक्वायरमेंट(एआरआर) की मांग की थी. हालांकि आयोग द्वारा 5973.46 करोड़ का एआरअार ही स्वीकृत किया गया. वितरण निगम के अनुुसार टैरिफ स्वीकृत होने के बावजूद निगम को 1411.94 करोड़ रुपये का सालाना घाटा होगा.
