रामगढ़ के जारा टोला और पारे बस्ती में मनाया गया सरहुल पर्व, सुख-समृद्धि की कामना की

Ramgarh Sarhul: रामगढ़ के जारा टोला और पारे बस्ती में सरहुल पर्व पारंपरिक रीति से मनाया गया. सरना स्थल पर पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि, प्रकृति संरक्षण और विश्व शांति की कामना की गई. इस मौके पर जनप्रतिनिधि और समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए और संस्कृति को आगे बढ़ाने का संदेश दिया. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

रामगढ़ से भागीरथ महतो की रिपोर्ट

Ramgarh Sarhul: झारखंड के रामगढ़ शहर के जारा टोला और पारे बस्ती सहित जिले के विभिन्न क्षेत्रों में सरहुल पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हर्षोल्लास में मनाया गया. सरना समिति जारा टोला द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में स्थानीय लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली. पूरा माहौल श्रद्धा, आस्था और उत्साह से सराबोर नजर आया.

ध्वज परिवर्तन के साथ शुरू हुई पूजा

जारा टोला स्थित सरना स्थल पर कार्यक्रम की शुरुआत ध्वज परिवर्तन के साथ हुई. इसके बाद पाहन द्वारा विधि-विधान के साथ सरना मां की पूजा-अर्चना की गई. पूजा के दौरान गांव, समाज और देश की सुख-समृद्धि की कामना की गई. साथ ही प्रकृति की रक्षा और संतुलन बनाए रखने के लिए विशेष प्रार्थना की गई.

विश्व शांति और प्रकृति संरक्षण की कामना

सरहुल पर्व के अवसर पर केवल स्थानीय खुशहाली ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया में शांति स्थापित हो और वर्तमान में चल रहे युद्धों का जल्द समाधान निकले, इसके लिए भी प्रार्थना की गई. यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और मानव व पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है.

पारे बस्ती में अच्छी रही लोगों की उपस्थिति

पारे बस्ती में आयोजित सरना पूजा में कई प्रमुख लोग शामिल हुए. इस अवसर पर लोहरदगा के अपर समाहर्ता जितेंद्र मुंडा, आदिवासी छात्र संघ के जिला अध्यक्ष सुनील मुंडा, कोयलांचल प्रभारी प्रकाश करमाली, दिलखुश मीना, श्रीवास्तव मुंडा, रवि मुंडा, प्रकाश मुंडा, राजू करमाली, विजय कश्यप और अनिल मुंडा सहित कई लोग उपस्थित रहे.

युवाओं को परंपरा से जोड़ने की अपील

कार्यक्रम के दौरान आदिवासी छात्र संघ के जिला अध्यक्ष सुनील मुंडा ने कहा कि सरहुल पर्व हमारी संस्कृति और पहचान का प्रतीक है. उन्होंने युवाओं से अपनी परंपराओं को समझने और अपनाने की अपील की. उनका कहना था कि नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि समाज की एकता और प्रकृति संरक्षण का संदेश आगे बढ़ सके.

सरहुल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

सरना समिति जारा टोला के पाहन संदीप मुंडा ने बताया कि सरहुल प्रकृति पूजा का पवित्र पर्व है, जिसमें सरना मां और साखू वृक्ष की पूजा की जाती है. यह पर्व आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है. इस दिन गांव, समाज और देश की खुशहाली के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं.

समाज के लोगों की सक्रिय भागीदारी

कार्यक्रम को सफल बनाने में सरना समिति के अध्यक्ष जुगेश मुंडा, कोषाध्यक्ष रामु मुंडा, सचिव उत्तम मुंडा, सह सचिव धनेश्वर मुंडा सहित कई सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके अलावा प्रेम मुंडा, राहुल मुंडा, हरेश सामु, पवन, राजू, करण, विक्की, नेहाल, सूरज मुंडा और रमेश सहित बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग उपस्थित रहे.

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संस्कृति और एकता का संदेश

सरहुल पर्व ने एक बार फिर यह साबित किया कि यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है. इस आयोजन के माध्यम से लोगों ने मिलकर खुशहाली, शांति और समृद्धि की कामना की और सामाजिक एकजुटता का संदेश दिया.

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लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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