दो किसानों ने स्ट्राबेरी की खेती कर बनायी अपनी पहचान

प्रखंड के सगुना पंचायत के बिकुआ गांव के किसान रंजित कुमार व रत्नेश कुमार ने स्ट्राबेरी की खेती शुरू कर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी है.

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रामनरेश तिवारी, पाटन

प्रखंड के सगुना पंचायत के बिकुआ गांव के किसान रंजित कुमार व रत्नेश कुमार ने स्ट्राबेरी की खेती शुरू कर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी है. इससे उन लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है. अपने इस कार्य में छह मजदूरों को भी अपने साथ जोड़कर उन्हें रोजगार दिया है. दोनों किसानों ने मिलकर करीब एक एकड़ में स्ट्राबेरी की खेती शुरू किया है. रंजीत कुमार ने बताया कि स्ट्राबेरी की खेती की शुरुआत विजयादशमी के दिन से किया था. तब उनके पास पूंजी का अभाव था. फिर भी वे मन में ठान लिया कि स्ट्राबेरी की खेती करना है. इसके लिए चाहे उन्हें जो कुछ भी करना पड़ेगा करेंगे. बैंक से लोन लेना होगा तो लेंगे. लेकिन स्ट्राबेरी की खेती की शुरुआत अवश्य ही करेंगे. उनके द्वारा लिया गया यह संकल्प उन्हें कार्य करने के लिए प्रेरित किया. सबसे पहले खेत की अच्छी तरह सात बार खेत की जुताई की. जिसमें 16 हजार रुपये लागत आयी. इसके बाद दो लाख 20 हजार रुपये का पुणे से पौधा मंगाये. इसके लिए एक फॉरमेन व सहायक रखे हैं जो स्ट्राबेरी की खेती का जानकार हैं. इसके लिए उन्हें प्रत्येक महीने 32 हजार रूपये देना होता है. इसके साथ ही प्रति दिन छह मजदूर काम करते हैं. उन्होंने बताया कि अभी तक उनके द्वारा करीब साढ़े छह लाख रुपये खर्च किया जा चुका है. लेकिन पूंजी वापस हो गयी है अब से जो फल की बिक्री होगी, उसका भी पैसा मिलेगा. इससे उनका पूरा मुनाफा होगा. उन्होंने बताया कि स्ट्राबेरी का चार जगह बाजार है. जिसमें रांची, कोलकाता, वाराणसी व मेदिनीनगर है. कीमत के मामले में सबसे अच्छा रांची का बाजार है. जहां अच्छी कीमत मिलती है. हालांकि फल की क्वालिटी अच्छी होना चाहिये. लेकिन कोलकाता में किसी प्रकार का हो सब बिक्री हो जाती है. लेकिन कीमत थोड़ी कम मिलती है. उन्होंने बताया कि दिसंबर जनवरी में अच्छी कीमत मिलती है. 600 से 650 रूपये कैरेट बिक्री होती है. क्योंकि इसकी मांग बहुत ज्यादा होता है और बाजार स्ट्राबेरी कम पहुंच पाता है. लेकिन इसके बाद बाजार में गिरावट आने लगता है.प्रति कैरेट 250 से 300 रुपये कीमत हो जाती है. क्योंकि बाजार में फल अधिक मात्रा में मिलने लगता है. उन्होंने कहा कि किसान चाहे तो अपनी आर्थिक आमदनी दुगुनी सफलता पूर्वक कर सकता है. किसानों के सबसे पहले जुनून फिर पूंजी का होना आवश्यक है. उन्होंने बताया कि अप्रैल महीने में स्ट्राबेरी की खेती समाप्त हो जायेगी. इसलिए इसके लिए उन्होंने इसी खेत में तरबूज, खरबूजा लगा दिया है. जो गर्मी में तैयार हो जायेगा. उन्होंने कहा कि उसके पास सिंचाई की समस्या है. वह हैंड बोरिंग करा कर स्ट्राबेरी की खेती किया है. अगर उन्हें एक डीप बोर मिल जाता तो वे और बेहतर ढंग से खेती कर पाते. हालांकि डीप बोर को लेकर बीडीओ से मुलाकात किया था. लेकिन अभी तक कोई लाभ नहीं मिल पाया है. उन्होंने कहा कि उन्हें इस वर्ष आठ से 10 लाख रुपये का मुनाफा हो सकता है. किसान रत्नेश कुमार ने कहा कि केंद्र व राज्य दोनों ही सरकार चाहती है कि किसानों की स्थिति में सुधार हो. किसानों की आर्थिक आमदनी दुगुनी हो किसान आत्मनिर्भर बनें. लेकिन यह तभी संभव हो पायेगा, जब सरकार किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाये. साथ ही पूंजी भी उपलब्ध कराये.

ससुराल से मिली खेती करने की प्रेरणा

रंजीत कुमार ने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती करने की प्रेरणा उन्हें अपने ससुराल से मिली. वे जब कभी ससुराल जाते थे तो हरिहरगंज के कउवल में गाड़ी रोक कर स्ट्राबेरी के खेती को देखते थे उसकी जानकारी लेते थे. तभी उन्होंने स्ट्राबेरी की खेती करने का संकल्प लिया.जब इसकी खेती करने के लिए मन में ठान लिया तो पूंजी की आवश्यक पड़ी. इसे लेकर वे बैंक पहुंचे जहां से उन्हें 50 हजार रूपये का केसीसी ऋण देने का आश्वासन मिला. लेकिन स्ट्राबेरी की खेती के लिए 50 हजार रूपये का कोई मतलब नहीं है. इसके लिए बड़ी पूंजी चाहिये. किसान की आर्थिक आय धान का पैदावार से नहीं हो सकता है न तो देश के किसान खुशहाल हो सकेंगे और न ही देश समृद्ध हो पायेगा.

स्ट्राबेरी की खेती का उपयुक्त समय अगस्त से है

फॉरमेन रामप्रसाद राम ने बताया कि स्ट्राबेरी की खेती अगस्त महीने के बाद शुरू किया जाता है और दूसरे वर्ष अप्रैल महीने तक चलता है. उन्होंने बताया कि दिसंबर जनवरी में बाजार में स्ट्राबेरी फल कम पहुंच पाता है. जिसके कारण जो भी पहुंचता है.जो किसान दिसंबर जनवरी का सीजन पकड़ लेते हैं. वैसे किसान अच्छा मुनाफा ले लेते हैं. जो किसान सीजन नहीं पकड़ पाते हैं अच्छी कीमत नहीं ले पाते हैं. उन्होंने बताया कि जहां कम पानी है.वहां के किसान भी इसका लाभ ले सकते हैं. इसके लिए टपक सिस्टम है. यही सिस्टम यहां भी लागू है.मोटर से पतली पाइप निकली है. जो मेढ़ के बगल से गयी है. उसी पाइप से पौधा के जड़ तक पानी पहुंच रही है. जिससे कम पानी में सिंचाई हो जा रही है.

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By Prabhat Khabar News Desk

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