मिथिलेश झा/अमलेश नंदन सिन्हा
झारखंड विधानसभा चुनाव में राजनेताओं और जनता के मुद्दे अलग-अलग हैं. प्रत्याशियों के लिए बिजली, पानी और सड़क अहम मुद्दा है, तो आम जनता के लिए इससे अलग भी कई मुद्दे हैं. बात बिश्रामपुर विधानसभा क्षेत्र की जनता की करें, तो उन्हें अनुच्छेद 370, राम मंदिर या राफेल से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है. लोग स्वीकार करते हैं कि सड़कें बनी हैं, बिजली के खंभे गाड़े गये हैं और उन पर तार भी डाल दी गयी है. कुछ गांवों में बिजली नहीं पहुंची है. उम्मीद है कि जल्दी ही बिजली पहुंच जायेगी.
इसलिए ये अब बहुत अहम मुद्दे नहीं रहे. बिश्रामपुर विधानसभा क्षेत्र के जो इलाके पलामू जिला में पड़ते हैं, वहां के लोगों का कहना है कि उनके खेतों तक सिंचाई की सुविधा पहुंचायी जाये. बंद पड़े कोयला खदानों में काम शुरू किया जाये, ताकि लोगों को रोजगार मिल सके. बंद पड़ी सिंचाई परियोजनाओं को चालू करवाया जाये, ताकि किसान खेती करके अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके. वित्तरहित शिक्षकों को स्थायी किया जाये, ताकि गांवों में शिक्षा की व्यवस्था सुधरे.
स्थानीय लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंडल डैम के पुनरोद्धार की बात कही, तो उम्मीद जगी कि क्षेत्र के खेतों की प्यास बुझेगी. किसान फिर से अन्नदाता बनेगा. लेकिन, अब तक मंडल डैम पर काम शुरू नहीं हुआ. इससे निराशा हुई है. 1987 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने कौरव जलाशय योजना का शिलान्यास किया था. आज तक उस योजना को आगे नहीं बढ़ाया गया. यदि जलाशय बन गया होता, तो 5-6 गांव के 100 फीसदी खेतों तक पानी पहुंचता और खेती आसान हो जाती. पर, ऐसा हो न सका.
रोजगार पर भी लोगों का जोर है. यह अहम मुद्दा है. लोगों ने बताया कि अक्टूबर, 2019 में पड़वा स्थित रजहरा कोलियरी से उत्पादन शुरू होना था. अब तक चालू नहीं हुआ. इस खदान में पानी भरा है. खदान के पानी को यदि बाहर निकाल दिया जाये, तो कोलियरी के आसपास के क्षेत्र के तमाम खेत भी सिंचित हो जायेंगे और गांवों में लोगों को पीने का पानी भी मिल जायेगा. इसके बाद खनन शुरू हो जायेगा, तो लोगों को रोजगार भी मिलेगा. इस पर कोई बात नहीं करता. विधायक सिर्फ अपना विकास कर रहे हैं और सरकार सिर्फ सब्जबाग दिखा रही है.
