मेदिनीनगर : मेदिनीनगर नगर निगम के वार्ड नंबर 19 व 20 के कई हिस्से के लोग जिसमें कांदू मुहल्ला व बेलवाटिका का भी कुछ भाग आता है. वहां के लोग पानी के लिए परेशान हैं. पानी के लिए वैसे तो वृहद शहरी जलापूर्ति योजना के फेज वन के तहत जिन इलाकों में पानी पहुंचना था, उन इलाकों में वार्ड नंबर 19- 20 भी शामिल है.
लेकिन तकनीकी खामी के कारण पिछले 15 वर्षों से इस इलाके के लोग परेशान हैं, पर उनकी समस्या दूर नहीं हो रही है. स्थिति यह है कि शहरी क्षेत्र में रहने के बाद भी लोगों को पानी लाने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है. पलामू में प्रचंड गरमी पड़ रही है. चिलचिलाती धूप में भी महिलाओं को पानी के लिए जद्दोजहद करते हुए देखा जा रहा है.
क्योंकि जलापूर्ति का लाभ मिल नहीं रहा है और चापानल जल स्तर नीचे चले जाने के कारण सूख गये हैं. निगम द्वारा टैंकर से जो जलापूर्ति करायी जा रही है, वह समस्या से हिसाब कम पड़ रहा है. ऐसे में यह स्वाभाविक है कि पानी के लिए मारामारी होगी. ऐसे इलाकों में जब पानी लेकर टैंकर पहुंचती है, तो पानी लेने के लिए होड़ सी मच जाती है. किसी तरह लोग पानी लेते है. कांदू मुहल्ले के सत्या देवी चिलचिलाती धूप में पंपूकल से पानी लेकर आ रही थी. सत्या देवी के साथ महिलाओं का समूह था.
पूछने पर सत्या देवी बताने लगी कि समस्या विकराल रूप ले चुका है. साल दर साल गरमी बढ़ रही है.जल स्तर नीचे जा रहा है और जलापूर्ति की व्यवस्था नहीं हो रही है. कोयल नदी भी सूख चुकी है. चुआड़ी खोदने में भी मेहनत करना पड़ रहा है. इसलिए उनलोगों की यह कोशिश रहती है कि अहले सुबह धूप होने के पहले ही पानी का इंतजाम कर लें. ताकि जरूरत पूरी हो सके. पंपूकल से जो पानी ले जाते हैं, उसका उपयोग खाना बनाने व पीने के लिए करते हैं. टैंकर तो आता है, पर उसका कोई निर्धारित समय नहीं है. जिस तरह की मारामारी होती है, उसमें कोई जरूरी नहीं है कि पानी मिल ही जाये. इसलिए वे लोग पंपूकल आकर पानी ले जाते हैं.
शहरी जलापूर्ति योजना फेज वन का भी अपेक्षित लाभ नहीं: मेदिनीनगर में पेयजल की समस्या नयी नहीं है. पिछले कई वर्षों से यह इलाका गंभीर पेयजल संकट झेल रहा है. इसलिए शहर को पेयजल संकट से निजात दिलाने के लिए राज्य गठन के बाद 2001-2002 में वृहद शहरी जलापूर्ति योजना को स्वीकृति दी गयी थी. जिस समय यह योजना स्वीकृत हुई थी, उस समय यह बताया गया था कि इस योजना के पूरा हो जाने के बाद शहर 50 वर्षों तक के लिए पेयजल संकट से मुक्त हो जायेगा. दो फेज में यह काम होना था.
फेज वन का उद्घाटन एक मई 2005 को हुआ है. लेकिन जानकारों का कहना है कि फेज वन में भी कई तरह की तकनीकी खामी थी. इसे लेकर जैकवेल का निर्माण करना था. लेकिन जहां जैकवेल का निर्माण हो रहा था, वहां पत्थर पड़ गया. उसके बाद से जैकवेल का निर्माण ही नहीं हो सका. बगैर जैकवेल के निर्माण के ही योजना शुरू हो गयी. जैकवेल को कैसे व्यवस्थित किया जाये, इसे लेकर अभियंताओं की टीम ने कई शहरों का दौरा किया, ताकि तकनीकी खामी दूर हो सके. लेकिन सफलता नहीं मिली.
पुराने कुएं से ही फेज वन को जोड़ दिया गया. अब स्थिति यह है कि कोयल नदी सूखने के बाद वह कुआं भी जवाब दे देता है. विभाग द्वारा नदी में चैनल खोदकर जलापूर्ति की व्यवस्था की जाती है. बताया जाता है कि चैनल खोदकर पेयजलापूर्ति के लिए जो व्यवस्था की गयी है, उसमें भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है. विभाग के लोगों का कहना है कि लगातार दो मोटर चले, तो पानी सूख जाता है. इसलिए यह व्यवस्था की गयी है कि प्रतिदिन एक मोटर चलाकर शहर के जलमीनार को फूल किया जायेगा. ऐसी स्थिति में नियमित जलापूर्ति नहीं हो पा रही है.
