बूंद-बूंद पानी को तरसे गराडीह गांव के लोग

गो-पालन और दूध की सप्लाई के लिए मशहूर गराडीह गांव के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं. मार्च में शुरू हुई यह समस्या मई और जून में कितना विकराल रूप लेगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में सिर्फ एक चापानल काम कर रहा है. नदी, नाले और डोभा […]

गो-पालन और दूध की सप्लाई के लिए मशहूर गराडीह गांव के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं. मार्च में शुरू हुई यह समस्या मई और जून में कितना विकराल रूप लेगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में सिर्फ एक चापानल काम कर रहा है.
नदी, नाले और डोभा सूख गये हैं. शासन-प्रशासन बार-बार समस्या के निदान की बात करता है, लेकिन होता कुछ नहीं. इसलिए पानी के लिए अभी से हाहाकार मचा है. जल्द ही कोई व्यवस्था नहीं हुई, तो लोहरदगा के गराडीह गांव में लातूर जैसे हालात हो सकते हैं, जहां पिछले दिनों पेयजल के वितरण के लिए निषेधाज्ञा लगानी पड़ी थी.
लोहरदगा : कैरो प्रखंड के गजनी पंचायत के गराडीह गांव की आबादी लगभग पांच हजार है. टोंगरी पर बसे गांव में पानी के लिए अभी से हाहाकार मचा है. लोग दो-तीन किलोमीटर दूर से प्यास बुझाने के लिए पानी लाते हैं.
पठारी क्षेत्र में प्रशासन ने पांच-छह जगहों पर डीप बोरिंग कराने की कोशिश की, लेकिन हर जगह फेल हो गया. आदिवासी मुहल्ला में एकमात्र चापानल से लोगों को पानी मिलता है. मुसलिम मुहल्ला में एक कुआं है, जिसमें कुछ पानी रहता है. पूरे मुहल्ले का काम इसी कुएं से चलता है. महिलाओं को पानी के लिए रात से ही लाइन लगाना पड़ता है. कोई आगे-पीछे हो जाये, तो नोंक-झोंक तय है. कभी-कभी मारपीट तक की नौबत आ जाती है.
गराडीह गांव गाय पालन एवं दूध की बिक्री के लिए मशहूर है. गांव से सैकड़ों लीटर दूध लोहरदगा डेयरी को मिलता है. हर घर में दो-तीन दुधारू गाय है. पानी की किल्लत से गाय पालनेवाला हर शख्स परेशान है. इनकी चिंता यह है कि जब इनसान के पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है, तो मवेशी को कहां से पानी पिलायेंगे. यदि मवेशी का खान-पान ठीक नहीं होगा, तो दूध कहां से मिलेगा. ऐसे में गाय पालन करनेवालों की आजीविका पर भी संकट आ जायेगा. लोगों ने बताया कि गर्मी के मौसम में बड़ी संख्या में लोग अपनी गाय बेच देते हैं.
मकसूद आलम बताते हैं कि गर्मी में दुधारू गाय रखना परेशानी का कारण बन जाता है. यहां नदियों एवं पास के गांव के कुएं से टैंकर में पानी भर कर लाया जाता है. उसी पानी से कई दिनों तक काम चलता है. टैंकर से लाकर डाला गया पानी भी लोगों की प्यास बुझाने में कारगर साबित नहीं हो रहा है. दो-तीन टैंकर पानी कुआं में डाला जाता है, तो उससे किसी तरह चार-पांच दिन काम चल पाता है.
दरअसल, कुआं के नीचे चट्टान है और यहां कोई जलस्रोत नहीं है. इसलिए जलस्तर बढ़ ही नहीं पाता. नदी से भरते हैं कुआं
टैंकर में पानी भरकर लाने के लिए नदी में जेसीबी से गडढा खोदकर पानी निकालना पड़ता है. उन्होंने बताया कि कई ऐसे किसान भी हैं जो दूध रांची ले जाकर बेचते हैं. वे किसान जिस केन में दूध ले जाते हैं उसी केन में पानी भरकर रांची से लाकर अपना काम चलाते हैं. पठारी क्षेत्र होने के कारण यहां कुंआ भी सफल नहीं हो पाता. बरसात के मौसम में तो पानी रहता है लेकिन गर्मी के मौसम आते ही यहां के लोग पानी के लिए परेशान रहते हैं.
तमाम समस्याओं के बीच अच्छी बात यह है कि क्षेत्र के लोगों ने अपनी समस्या का हल ढूंढ़ निकाला है. बिना किसी सरकारी मदद के अपनी सहायता आप कर रहे हैं. दुनिया को इनसे सीखना चाहिए कि एक पंथ दो काज कैसे होते हैं. ये दूध बेचने लोहरदगा या रांची जाते हैं और वहां से दूध के ड्रम में पानी भर कर ले आते हैं, जो उनके घर-परिवार के साथ-साथ मवेशी के पीने के काम आता है.

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