खूंटी से भूषण कांसी की रिपोर्ट
Khunti Ram Navami History: परंपरा, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक रामनवमी महोत्सव खूंटी में इस वर्ष भी ऐतिहासिक गौरव के साथ मनाया जाएगा. जिला मुख्यालय में करीब 87 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के दिलों में वैसी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है, जैसी इसकी शुरुआत के समय थी.
खूंटी में कब शुरू हुआ था रामनवमी का जुलूस
खूंटी में रामनवमी जुलूस की शुरुआत वर्ष 1939 में हुई थी. बताया जाता है कि वर्ष 1938 में तत्कालीन अंग्रेज एसडीओ वेबस्टल जुलूस की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन रामकिस्टो साव उर्फ घसिया साव, रामटहल भगत और नारायण चौधरी गिरधारी गंझु जैसे समाजसेवियों के अथक प्रयास से रांची के तत्कालीन डीसी ने इसकी अनुमति दी. इसके बाद दो झंडों के साथ पहला जुलूस निकाला गया, जिसने इतिहास रच दिया.
1950 में मेला और खेलकूद प्रतियोगिता की शुरुआत
प्रारंभिक वर्षों में यह पर्व केवल एक दिन चैत शुक्ल नवमी को मनाया जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी भव्यता बढ़ती गई. वर्ष 1950 में दशमी के दिन आश्रम मैदान में मेला सह खेलकूद प्रतियोगिता की शुरुआत हुई, जिसका उद्घाटन तत्कालीन बिहार के राज्यपाल एमएस अन्ने ने किया था. अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने इस आयोजन की सराहना की थी.
इन लोगों ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
धीरे-धीरे खूंटी की पहचान पूरे प्रदेश में रामनवमी महोत्सव के लिए बनने लगी. आदित्य साहू, सुखू साहू, वनवारी सिंह, नंदकिशोर भगत, शिवअवतार चौधरी और कस्तूरी लाल सुरेंद्र मिश्रा जैसे लोगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
15-20 दिन पहले शुरू हो जाती हैं तैयारियां
वर्तमान में शहर में 15-20 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं. विभिन्न अखाड़ा और मंडलियां इस आयोजन को जीवंत बनाती हैं. 1950-60 के दशक में जहां करीब 60 मंडलियों की शोभायात्रा निकलती थी, वहीं आज भी उसी उत्साह के साथ ग्रामीण और शहरी क्षेत्र की सैकड़ों मंडलियां भाग लेती हैं.
क्या कहते हैं बुजुर्ग
75 वर्षीय आदित्य प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि वे 1955 से इस परंपरा से जुड़े हुए हैं और आज भी प्रथम झंडा पूजा में उनकी अहम भूमिका रहती है. वे बताते हैं कि पहले हाथी-घोड़े और पारंपरिक वेशभूषा के साथ शोभायात्रा निकलती थी, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग उमड़ पड़ते थे.
इसे भी पढ़ें: नहाय-खाय के साथ आज से शुरू हो गया चैती छठ महापर्व, मंगलवार को पहला अर्घ्य
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की मिसाल
रामनवमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि खूंटी की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत मिसाल है. इसमें सभी समुदायों की भागीदारी इसे और भी विशेष बनाती है. यह पर्व हर वर्ष लोगों के बीच भाईचारे, सौहार्द और आपसी विश्वास का संदेश देता है, जो खूंटी की पहचान बन चुका है.
इसे भी पढ़ें: रामनवमी से हनुमान जयंती तक झारखंड में स्पेशल अलर्ट, हजारीबाग अतिसंवेदनशील
