जमशेदपुर : क्रिकेट इतिहास में अक्टूबर 2013 का वह सप्ताह आज भी एक अलग किस्से की तरह याद किया जाता है. वजह थी क्रिकेट का मुकाबला, लेकिन उससे कहीं ज्यादा वजह थी एक स्टार खिलाड़ी की दीवानगी. कीनन स्टेडियम में 27 से 30 अक्टूबर तक झारखंड और दिल्ली के बीच रणजी ट्रॉफी ग्रुप-ए का मुकाबला होना था. दिल्ली की टीम में वीरेंद्र सेहवाग, गौतम गंभीर और आशीष नेहरा जैसे बड़े नाम थे. ऐसे में जमशेदपुर के क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह मैच किसी बड़े आयोजन से कम नहीं था. सेहवाग उस दौर में भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित और आक्रामक बल्लेबाजों में शामिल थे. उनकी एक झलक पाने के लिए शहर के क्रिकेट प्रेमी उत्साहित थे. मैच से पहले ही कीनन स्टेडियम में दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ गयी थी. लेकिन मौसम ने पूरा खेल बिगाड़ दिया. मुकाबले से पहले ही लगातार बारिश ने मैदान की स्थिति खराब कर दी थी.
चार दिन इंतजार, एक गेंद भी नहीं
27 अक्तूबर को मैच शुरू होना था, लेकिन मैदान खेलने लायक नहीं था. इसके बाद हर दिन दर्शक इस उम्मीद में स्टेडियम पहुंचते रहे कि शायद आज सेहवाग का बल्ला चलता दिखाई देगा. बारिश रुकती, मैदान का निरीक्षण होता और फिर खेल शुरू होने की उम्मीद बंधती. लेकिन खराब आउटफील्ड के कारण इंतजार खत्म नहीं हुआ. आखिरकार 30 अक्टूबर को चार दिन के इंतजार के बाद मैच को रद्द कर दिया गया. दोनों टीमों को एक-एक अंक मिला और मुकाबला बिना एक भी गेंद खेले समाप्त हो गया.
मैच रद्द होते ही फूटा गुस्सा
जिस मैच को देखने के लिए दर्शक कई दिनों से उम्मीद लगाए बैठे थे, उसके रद्द होने की घोषणा के बाद स्टेडियम में मायूसी छा गयी. इसके बाद दर्शकों के एक हिस्से ने मैदान की ओर पत्थर और खाली पानी की बोतलें फेंकीं. उस समय की रिपोर्ट के मुताबिक, दर्शकों की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि लगातार चार दिनों तक उन्हें अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को मैदान पर देखने का मौका नहीं मिला. हालांकि, घटना को लेकर पुलिस का पक्ष अलग था.
मैच नहीं होने से दर्शकों ने गैलरी में किया हंगामा
बिष्टुपुर के तत्कालीन थाना प्रभारी ने पत्थरबाजी की घटना से इनकार करते हुए कहा था कि मैच नहीं होने से नाराज दर्शकों ने गैलरी में हंगामा किया, जिसे पुलिस ने तुरंत नियंत्रित कर दिया. वहीं, जेएससीए के तत्कालीन सचिव राजेश वर्मा ने भीड़ की निराशा का जिक्र करते हुए कहा था कि दर्शक गौतम गंभीर और वीरेंद्र सेहवाग जैसे खिलाड़ियों को देखने के लिए लगातार स्टेडियम पहुंच रहे थे. चार दिनों तक क्रिकेट के सितारों की एक झलक का इंतजार और अंत में बिना एक गेंद खेले मैच का खत्म हो जाना — 2013 का वह मुकाबला स्कोरबोर्ड पर भले ही कुछ दर्ज नहीं करा सका, लेकिन जमशेदपुर के क्रिकेट प्रेमियों की यादों में जरूर दर्ज हो गया. कीनन स्टेडियम के उस दौर की कहानी आज भी बताती है कि इस शहर में क्रिकेट केवल खेल नहीं, बल्कि जुनून रहा है.
