मरांग गोमके सिंह मुंडा की जयंती पर विशेष
Jamshedpur News :
करनडीह स्थित आदिवासी भवन झारखंड आंदोलन का मूक साक्षी रहा है. यह वही स्थान है, जहां आंदोलन की नींव को मजबूत किया गया और भावी रणनीतियों पर चर्चा होती थी. झारखंड आंदोलन के प्रणेता मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा अक्सर इसी आदिवासी भवन में ठहरते थे. यहां वे अन्य झारखंड आंदोलनकारी नेताओं के साथ बैठकर आंदोलन को धारदार बनाने की योजनाएं बनाते थे. इसी भवन में बैठकों, विचार-विमर्श और संगठनात्मक निर्णयों के माध्यम से आंदोलन को दिशा दी जाती थी. झारखंड पार्टी के दिग्गज नेता एनई होरो का भी यहां नियमित आना-जाना था. आदिवासी भवन उस दौर में केवल एक इमारत नहीं, बल्कि आंदोलनकारियों की ऊर्जा, संकल्प और संघर्ष का प्रतीक था. 1 जनवरी 1950 में करनडीह में मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी महासभा का एक सम्मेलन हुआ था. जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए थे. इसी सम्मेलन में आदिवासी महासभा का नाम बदलकर झारखंड पार्टी किया गया था. जिसमें अध्यक्ष- मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा को ही बनाया गया था. जिस मैदान में आदिवासी महासभा का सम्मेलन का आयोजन किया गया था. उस सम्मेलन के बाद से ही मैदान का नाम जयपाल स्टेडियम रख दिया गया. वर्तमान समय में उस खुले मैदान को जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम बनाया जा रहा है.झारखंड आंदोलन का गढ़ रहा है करनडीह
पूर्वी सिंहभूम जिले के जमशेदपुर प्रखंड अंतर्गत करनडीह क्षेत्र को झारखंड आंदोलन का गढ़ माना जाता है. अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर जो चिंगारी यहां सुलगी, उसने धीरे-धीरे पूरे झारखंड को अपनी आगोश में ले लिया. करनडीह वह भूमि है, जहां आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और स्वशासन के अधिकारों को लेकर विचार मंथन हुआ. आंदोलन के शुरुआती दौर में यहां से उठी आवाज ने झारखंडी समाज को एकजुट किया और एक सशक्त जनांदोलन का रूप दिया. करनडीह न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि वैचारिक रूप से भी आंदोलन का केंद्र रहा, जहां से अलग राज्य का सपना आकार लेने लगा. आज के समय में आदिवासी भवन भले ही विरान सा नजर आता हो, लेकिन इसकी दीवारों में झारखंड आंदोलन की अनगिनत कहानियां समाहित हैं. अलग राज्य की मांग के दौर में यह भवन आंदोलनकारियों का प्रमुख केंद्र बिंदु हुआ करता था. यहां दिन-रात बैठकों का दौर चलता था, रणनीतियां बनतीं और आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने की योजनाएं तैयार होती थीं. समय के साथ परिस्थितियां बदलीं, झारखंड अलग राज्य बना और आंदोलन का वह दौर इतिहास बन गया. लेकिन आदिवासी भवन का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है. यह स्थान आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष, एकता और अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देता है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
