झारखंड के राखा कॉपर माइंस क्षेत्र में आजादी के बाद से बंद पड़ी है सोने की खदान, खुले तो बढ़ेंगे रोजगार के अवसर

झारखंड के जादूगोड़ा अंतर्गत राखा कॉपर माइंस क्षेत्र में आजादी के बाद से सोने की खदान बंद पड़ी है. इसको खोलने को लेकर अब तक कोई विशेष पहल होती नहीं दिख रही है. ग्रामीणों का कहना है कि अगर इस खदान को खोल दिया जाये, तो कई को रोजगार उपलब्ध होगा.

Jharkhand News (जमशेदपुर, पूर्वी सिंहभूम) : पूर्वी सिंहभूम जिला अंतर्गत जादूगोड़ा थाना क्षेत्र के बोड़ामडेरा गांव में राखा कॉपर माइंस के पीछे संचालित की जाने वाली सोने के खदान का अस्तित्व मिटने के कगार पर है. चिमनी और सुरंग के रूप में इसके अवशेष मात्र हैं.

अंग्रेजों के जमाने में यह क्षेत्र सोना खदान (गोल्ड) के लिए प्रसिद्ध था. खदान से निकले सोने को परिष्कृत करने के लिए यहां चिमनी युक्त मशीनें लगायी गयी थीं. लेकिन, कालांतर में सरकार के उदासीन रवैये के कारण खदान के रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया गया. अगर यह खदान फिर से खुले, तो स्थानीय लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिल सकता है. इससे इनकी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी.

बता दें कि पूर्वी सिंहभूम जिले में अंग्रेज जमाने की कई चीजें आज भी उपलब्ध है. जादूगोड़ा थाना क्षेत्र के राखा स्थित हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) को भारत सरकार द्वारा संचालित किया जा रहा है.

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ग्रामीण बताते हैं कि उनके दादा-परदादा बोलते थे कि राखा कॉपर माइंस के पीछे अंग्रेजों ने दोनों पहाड़ों के बीच एक माइंस खोली थी, जहां सोना मिलता था. माइंस के ठीक सामने एक चिमनी बनायी गयी थी, जहां सोने को पिघलाया जाता था. इसके बाद उस सोने को अंग्रेज अपने देश भेजते थे. लेकिन, आजादी के साथ यह खदान भी बंद हो गयी. अंग्रेज देश छोड़ते वक्त खदान को सील कर चले गये थे. हालांकि, यहां चिमनी और कुछ घरें आज भी मौजूद हैं. जिस गड्ढे से सोना निकलता था, वहां सालोंभर पानी भरा रहता है.

वहीं, गांव के चरवाहों का कहना है कि पहले उस तरफ मवेशी चराने जाते थे, लेकिन गड्ढे में कई जानवर गिर जाते थे. इससे उनकी मौत हो जाती थी. इसके बाद चिमनी की ओर जाना छोड़ दिये. गांव के माझिया बास्के (58 वर्ष), नंदलाल महापात्र (60 वर्ष) और गुरबा मांझी (60 वर्ष) बताते हैं कि वर्षों पहले इस माइंस में उनके परिवार के लोग काम करते थे. तब यहां सोना पाये जाने की बात कही जाती थी. माइंस में आसपास के कई लोगों को रोजगार मिल जाता था. यदि यह माइंस दोबारा खुल जाती, तो क्षेत्र का विकास होता.

बूढ़ी खदान के नाम से जानी जाती थी माइंस

बूढ़ी खदान सुनने में अजीब-सा लगता है, लेकिन इस नाम के पीछे का अर्थ है कि यह के आदिवासी भाषा में गांव के बच्चों एवं बुजुर्ग महिलाओं को प्यार से बढ़ी बुलाया जाता है और इस खदान में उस समय केवल महिलाओं को ही काम करने की इजाजत थी. इसलिए इस खदान का नाम बूढ़ी खदान पड़ा था.

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Posted By : Samir Ranjan.

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