जमशेदपुर : जुस्को श्रमिक यूनियन और झारखंड आम मजदूर यूनियन की संयुक्त जनसभा सोमवार को साकची आम बागान मैदान में 12 बजे से होगी. इस सभा में मजदूरहित से जुड़ी समस्याओं पर मंथन के साथ-साथ वर्तमान सरकार की नीतियों से मजदूरों के समक्ष आयी चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया. रविवार को बिष्टुपुर जुस्को कार्यालय में दोनों यूनियनों की संयुक्त बैठक हुई जिसमें जनसभा को सफल बनाने पर विचार-विमर्श किया गया. बैठक में कमल किशोर अग्रवाल, देविका सिंह, परशुराम मिश्रा, एमए रहमान, ई सतीश कुमार, त्रिवेणी प्रसाद, राजीव पांडे, गुलरेज अंसारी आदि उपस्थित थे.
मंदी और ब्लॉक क्लोजर का असर मजदूरों पर
झारखंड आम मजदूर यूनियन के उपाध्यक्ष कमल किशोर अग्रवाल ने कहा आर्थिक मंदी के कारण हुए ब्लॉक क्लोजर का असर हजारों मजदूरों पर पड़ा है. आदित्यपुर के कई उद्योगों में ताले लग गये हैं. कंपनियों में कार्यरत मजदूरों के समक्ष भूखों मरने की स्थिति पैदा हो गयी है. परशुराम मिश्रा ने कहा कि मजदूरों को एकजुट होकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का समय आ गया है. वर्तमान सरकार को सत्ता से हटाना होगा. सोमवार की जनसभा को जमशेदपुर पश्चिमी के कांग्रेस प्रत्याशी बन्ना गुप्ता और जमशेदपुर पूर्वी के कांग्रेस प्रत्याशी प्रो गौरव वल्लभ के शामिल होने की संभावना है.
कई चुनौतियों से जूझ रहे असंगठित क्षेत्र के मजदूर
असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों की आय संगठित क्षेत्र की तुलना में न केवल कम है, बल्कि कई बार तो यह जीवन स्तर के न्यूनतम निर्वाह के लायक भी नहीं होती. अक्सर कृषि और निर्माण क्षेत्रों में पूरे वर्ष काम न मिलने की वज़ह से वार्षिक आय और भी कम हो जाती है. इस क्षेत्र में न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता, जो कि कर्मचारियों को दिया जाना बाध्यकारी है. इसलिए न्यूनतम मज़दूरी दरों से भी कम कीमतों पर ये कामगार अपना श्रम बेचने को विवश हो जाते हैं. वैसे भी हमारे देश में न्यूनतम मजदूरी की दरें वैश्विक मानकों की तुलना में बहुत कम हैं.
अस्थायी रोज़गार: असंगठित क्षेत्र में रोज़गार का स्वरूप अस्थायी होता है, जो इस क्षेत्र में लगे कामगारों को हतोत्साहित करता है. रोज़गार स्थिरता न होने के कारण इनमें मनोरोग का खतरा भी संगठित क्षेत्र के कामगारों से अधिक होता है. इनके पास विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं पहुंच पाता.बिचौलियों और अपने नियोक्ताओं द्वारा भी इनकी उपेक्षा की जाती है.
श्रम कानूनों के तहत नहीं आते: अधिकांश असंगठित श्रमिक ऐसे उद्यमों में काम करते हैंे जहां श्रमिक कानून लागू नहीं होते. इसलिये इनकी कार्य दशा भी सुरक्षित नहीं होती और इनके लिये स्वास्थ्य संबंधी खतरे बहुत अधिक होते हैं.
खतरनाक उद्यमों में भी सुरक्षा नहीं: बाल श्रम, महिलाओं के साथ अन्याय की सीमा तक असमानता और उनका शारीरिक, मानसिक तथा यौन-शोषण आम बात है.
कई व्यवसायों में स्वास्थ्य मानकों के न होने का मसला भी चुनौती के रूप में इस क्षेत्र से जुड़ा है. माचिस के कारखाने में काम करने वाले, कांच उद्योग में काम करने वाले, हीरा तराशने वाले, कीमती पत्थरों पर पॉलिश करने वाले, कबाड़ बीनने वाले, पीतल और कांसे के बर्तन बनाने वाले उद्यमों में बड़ी संख्या में बाल श्रमिक काम करते हैं. ऐसे मजदूर श्वास संबंधी बीमारियों के शिकार बन जाते हैं इन कामगारों का दैनिक जीवन चुनौतियों भरा है.
