रांची. ऊर्दू के उस्ताद शायर जहीर गाजीपुरी नहीं रहे. उनका निधन दो नवंबर को देर रात हजारीबाग स्थित उनके आवास पर हो गया. वे लगभग 78 वर्ष के थे. उनका जनाजा तीन नवंबर को हजारीबाग स्थित आवास से दिन के 11 बजे निकला. इसमें काफी संख्या में लोग शामिल हुए. ऊर्दू अदब में स्व गाजीपुरी की एक अलग पहचान थी. उनकी पहचान शायरी से बनी.
शायरी में खासकर गजल, दोहे, नज्म में नये-नये तजुर्बे भी किये. गजल की एक नयी विधा गजलनुमा के अविष्कारक भी कुछ वर्षों के लिए भी कहलाये. इन्होंने वर्ष 1983 में गजलनुमा का तजरूबा किया था, जिसे ऊर्दू के आलोचक डॉ मनाजिर आशिक हरगांवी ने अपनी 2009 की तहकीक में इनकी गजलनुमा को रद कर बिहार के शाहीद जमील को गजलनुमा का अविष्कारक की संज्ञा दी. वर्ष 2012 मे सुखनवारे अदब के लोकार्पण समारोह में इन्हें रांची आमंत्रित किया गया था. इन्होंने कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया.
60 के दशक में आ गये थे बिहार
वर्ष 1938 में जन्मे स्व गाजीपुरी 60 के दशक में बिहार आ गये. राज्य सरकार के ट्रांसपोर्ट विभाग में कार्यरत थे. वे कार्यालय सुपरिटेंडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए और हजारीबाग में बस गये.
कई किताबें भी आयीं
इन्होंने कई किताबें भी लिखीं हैं. इनमें मुख्य रूप से कोहरे की धूल, सब्ज मौसम की सदा, लफ्जो के परिंदे के अलावा झारखंड-बिहार के अहले कलम, गजल व फने गजल आदि शामिल हैं. जहीर गाजीपूरी प्रगतिशील परंपरा के शायर थे. वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े हुए थे. वर्ष 2000 के दशक में इसके अध्यक्ष भी थे.
