पेटी कॉन्ट्रैक्ट में छोटे ठेकेदार करा रहे काम

दुर्जय पासवान गुमला : गुमला शहर के लोगों की पुरानी मांग बाइपास सड़क है. झारखंड बनने से पहले से ही बाइपास सड़क बनाने की मांग हो रही थी, लेकिन झारखंड बनने के बाद यह मांग तेज हुई. कई आंदोलन हुए. जनता की जीत भी हुई. इस आंदोलन में स्थानीय सांसद व विधायकों का भी अहम […]

दुर्जय पासवान
गुमला : गुमला शहर के लोगों की पुरानी मांग बाइपास सड़क है. झारखंड बनने से पहले से ही बाइपास सड़क बनाने की मांग हो रही थी, लेकिन झारखंड बनने के बाद यह मांग तेज हुई. कई आंदोलन हुए. जनता की जीत भी हुई. इस आंदोलन में स्थानीय सांसद व विधायकों का भी अहम रोल रहा. आंदोलन का परिणाम है, बाइपास सड़क का निर्माण शुरू हुआ, लेकिन जिस तेजी से काम होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है. काम धीरे चल रहा है.
चौकाने वाली बात है कि करोड़ों रुपये के सड़क निर्माण कार्य को पेटी कॉन्ट्रैक्ट में छोटे ठेकेदार करा रहे हैं.स्थानीय स्तर के छोटे ठेकेदारों को पेटी कॉन्ट्रैक्ट में दे दिया है. नतीजा पीसीसी सड़क बनाने वाले ठेकेदार करोड़ों रुपये की सड़क जैसे-तैसे बना रहे हैं. लगातार घटिया सड़क निर्माण की शिकायत मिल रही है. केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत व डीसी श्रवण साय के अलावा स्थानीय विधायक शिवशंकर उरांव के पास भी शिकायत गयी है. संवेदक को सुधार का निर्देश दिया गया है. इसके बाद भी संवेदक नेताओं व अधिकारियों के दिशा-निर्देश को ठेंगा दिखा रहे हैं.
ज्ञात हो कि वर्ष 2002 से सड़क बन रही है, लेकिन तकनीकी कारणों के कारण काम बीच में रूक गया. अब जब काम शुरू हो रहा है, तो लागत दुगुनी हो गयी है. 2002 में 33 करोड़ रुपये से सड़क बननी थी. आज के डेट में सड़क की लागत 66 करोड़ 89 लाख रुपये हो गयी है. इसमें भूमि अधिग्रहण का पैसा अलग से है. भूमि अधिग्रहण में आठ करोड़ रुपये खर्च हुए हैं.
दो सीएम दो बार शिलान्यास कर चुके हैं
बाइपास सड़क के निर्माण का शिलान्यास पहली बार 25 अगस्त 2002 को हुआ था. राज्य के प्रथम सीएम बाबूलाल मरांडी ने शिलान्यास किया था. उस समय सिलम पेट्रोल पंप से होकर सड़क बननी थी. इसमें कुछ काम भी हुआ. करोड़ों रुपये बरबाद भी हुए. नगर पंचायत ने दोबारा डीपीआर बना कर नगर विकास विभाग को भेजा. डीपीआर में पांच लाख रुपये भी खर्च हुए, लेकिन मामला लटका गया. इसके बाद सरकार ने एनएच विभाग को सड़क बनाने का जिम्मा दिया. अब सड़क सिलम घाटी के पुल के समीप से बन रही है. दूसरी बार सीएम रघुवर दास ने 16 अप्रैल 2016 को शिलान्यास किया. इसके बाद भी काम कछुए की गति से चल रहा है.
अभी ये समस्या हो रही है : बाइपास सड़क नहीं है. जिससे शहर के लोग त्रस्त हैं. हर रोज जाम होती है. जाम होने पर घंटों लोगों को सड़क पर रेंगना पड़ता है. खास कर जब स्कूल की छुट्टी होती है या साप्ताहिक बाजार लगता है. उस समय जाम होती है. नेशनल हाइवे है.
इस रूट से प्रत्येक दिन एक हजार से अधिक बड़ी मालवाहक गाड़ियां गुजरती हैं. इसके अलावा 200 बस व हजारों छोटी गाड़ी है. शहर की सड़क भी संकीर्ण है, जिससे एक गाड़ी के फंसने पर सड़क जाम लग जाती है. जाम के कारण शहर के व्यवसाय सबसे ज्यादा प्रभावित होता है.
पार्किग की व्यवस्था नहीं : शहर में पार्किग की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि सबसे महत्वपूर्ण दुकानें एनएच के किनारे है. ग्राहक दुकान जाने से पहले सड़क के किनारे वाहन खड़ा कर देते हैं. छोटे वाहन खड़े होने के बाद मुख्य सड़क कई जगह जाम हो जाती है. यहां तक कि टेंपो स्टैंड भी नहीं है, जिस का नतीजा सड़कों पर टेंपो खड़े रहते हैं. बड़े वाहन शहर में घुसते ही सड़क जाम हो जाती है.
जानिये बाइपास सड़क को
लागत 66.89 करोड़ रु.
लंबाई 12.8 किमी होगी
चौड़ाई दस मीटर होगी
टोल प्लाजा आठ बनेंगे.
पुल आठ बड़े पुल बनेंगे.
कलवर्ट 33 बनेंगे.
जंक्शन तीन बनेंगे.
अधिग्रहण 160 एकड़ जमीन
मुआवजा 600 ग्रामीणों को दी
गांव 12 गांव की जमीन ली है.

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