गोड्डा जिले में शहरीकरण के कारण परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और इसके चलते गौरैया जैसे छोटे पक्षी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गये हैं. गौरैया न केवल पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने में अहम भूमिका निभाती है, बल्कि यह फसलों को नष्ट करने वाले कीड़े-मकोड़े को खाकर उनकी आबादी नियंत्रित करती है. इसके अतिरिक्त, यह परागण और बीज फैलाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है. गौरैया की घटती आबादी को देखते हुए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य शहरीकरण के कारण घटते छोटे पक्षियों का संरक्षण करना है.
चीन का ऐतिहासिक उदाहरण
गौरैया की अहमियत को समझने के लिए 1958 में चीन की घटना याद की जा सकती है. चीन के राष्ट्रपति माओ जेडोंग ने गौरैया को देश का दुश्मन मानते हुए इसे मारने का आदेश दिया. इसके तहत ग्रेट स्पैरो कैंपेन चलाया गया, जिसमें बर्तन और ड्रम बजाकर गौरैया को बैठने नहीं दिया गया और उनके घोंसले व अंडे नष्ट कर दिये गये. इसका असर हुआ कि कीड़े और टिड्डियों की संख्या बढ़ गयी, जिससे फसलें नष्ट हो गयीं और चीन में अकाल पड़ गया. करीब 4.5 करोड़ लोग भूख से मर गये. बाद में, चीन ने रूस से लाखों गौरैया पक्षियों को लाकर बसाया.गौरैया के विलुप्त होने के मुख्य कारण
पुराने घरों में रोशनदान और खपरैल होने से पक्षी आसानी से घर बना लेते थे, जबकि अब पक्के और शीशे वाले मकानों में उनका ठिकाना नहीं बचा. पहले महिलाएं खुले अनाज साफ करती थीं, जिससे गौरैया को दाना मिलता था, अब पैक्ड अनाज ने उनका भोजन छीना. बगीचों और खेतों में रसायनों का प्रयोग, जिससे छोटे कीड़े मर जाते हैं, जो गौरैया के चूजों का मुख्य आहार हैं. कुछ शोधों में दावा किया गया है कि मोबाइल टावरों की तरंगें गौरैया की दिशा खोजने और प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती हैं.
संरक्षण के उपाय : गोड्डा में गौरैया को बचाना आवश्यक
विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का कहना है कि प्रशासन और सरकार को संरक्षण पर गंभीर चिंतन करना होगा. इसके लिए पंचायत स्तर पर पौधरोपण और पशुपालन को बढ़ावा देना, स्थानीय संगठनों और युवाओं को अभियान में जोड़ना, घरों और स्कूलों में कृत्रिम घोसले लगवाना, गर्मियों में घरों और अन्य स्थानों पर पानी और दाना उपलब्ध कराना, स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा और विश्व गौरैया दिवस जैसे कार्यक्रम आयोजित करना आदि शामिल हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक आम जनता जागरूक नहीं होगी, तब तक गोड्डा जिले में गौरैया की आबादी बढ़ाना संभव नहीं होगा. गौरैया केवल एक छोटे पक्षी के रूप में नहीं, बल्कि गोड्डा की कृषि, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के संतुलन के लिए अहम है. शहर और गांव में बढ़ते निर्माण और रासायनिक खेती के बीच इसे बचाना अब हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बन गयी है.क्या कहते हैं पर्यावरणविद-
गोड्डा के बदलते परिवेश में गौरैया ने न केवल अपनी जगह बनाए रखी है, बल्कि खुद को यहां की परिस्थितियों के अनुसार ढाल भी लिया है. यह जीव और प्रकृति के बीच सामंजस्य का उत्कृष्ट उदाहरण है. यदि गौरैया इसी तरह पर्यावरण के अनुकूल ढलती रही, तो आने वाले वर्षों में गोड्डा में इनकी चहचहाहट और बढ़ेगी.
