सखुआ पेड़ की पूजा के बाद कार्यक्रम की शुरुआत हुई. मुख्य वक्ता नुनूलाल मरांडी ने कहा कि आदिवासी समाज आदिकाल से प्रकृति की पूजा करता आ रहा है. प्रकृति का संरक्षण और उसके बीच में रहने का गौरव आदिवासी समाज को मिला है. आज भी किसी आदिवासी गांव में जायेंगे, तो पहले जाहेर और बूढ़ा-बूढ़ी थान देखने को मिलेगा. यह वर्षों पुरानी विरासत है. आज भी इसे संजोकर रखा गया है. कहा कि पेड़-पौधों में जब नये पत्ता और फूल आते हैं तो संथाल समाज के लोग बड़ी प्रसन्नता के साथ इसकी पूजा कर खुशी मनाते हैं. इसे बाहा परब कहा जाता है. कहा कि बाहा परब के बाद ही नये अनाज को वे ग्रहण करते हैं. कहा कि आज दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है. ऐसे में अपनी पहचान बरकरार रखने का संकल्प लेने की जरूरत है.
एकजुट रहकर प्रकृति से जुड़े रहें
श्री मरांडी ने कहा कि गांव को मजबूत बनायें, एकजुट रहें और प्रकृति से जुडे रहें. कहा कि जब तक प्रकृति हरी भरी रहेगी, हमारा समाज भी उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होगा. कहा कि आपसी पाॅलिटिक्स से दूर रहकर हमें एकजुट रहना होगा और अपनी सभ्यता संस्कृति से जुड़े रहना होगा. सनातन मरांडी व नुनका टुडू ने भी लोगों को संबोधित किया. आयोजन को सफल बनाने में समिति के अध्यक्ष सुशील हांसदा, उपाध्यक्ष लालू मुर्मू, सचिव सुजीत हांसदा, उप सचिव देवन बेसरा, कोषाध्यक्ष मोहीलाल हांसदा सहित अन्य की सराहनीय भूमिका रही.
