उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण विधेयक के पारित नहीं होने का सबसे बड़ा कारण विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का नकारात्मक रवैया रहा. जहां एक ओर देश महिलाओं को बराबरी का हक देने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, वहीं दूसरी ओर कुछ दल अपने संकीर्ण स्वार्थों के चलते इस ऐतिहासिक कदम में बाधा उत्पन्न करते नजर आये.
कुछ दल महिला सशक्तीकरण को ले गंभीर नहीं
विपक्षी दलों द्वारा बार-बार अनावश्यक शर्तें, बहाने और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप इस विधेयक के रास्ते में रोड़े बनते रहे. उन्होंने कहा कि यदि इन दलों ने सकारात्मक सोच और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी होती, तो आज यह विधेयक कानून का रूप ले चुका होता और देश की महिलाओं को उनका हक मिल चुका होता. यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पंचायत और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण सफलतापूर्वक लागू हो चुका है, तो फिर संसद और विधानसभाओं में इसे लागू करने में इतनी बाधाएं क्यों? उत्तर साफ है कि कुछ राजनीतिक दल महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर गंभीर नहीं हैं और केवल दिखावटी समर्थन करते हैं. आज जरूरत है कि देश की जनता इस मुद्दे पर सजग हो और उन राजनीतिक ताकतों से जवाब मांगे, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी. लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है और वही यह तय करती है कि कौन वास्तव में समाज के विकास के लिए प्रतिबद्ध है.
