Giridih News :सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त की कमी, थैलेसीमिया मरीज प्रभावित
Giridih News :सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में इन दिनों खून की कमी हो गयी है. विभिन्न ब्लड ग्रुप की कमी के कारण जरूरतमंद मरीजों और उनके परिजनों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. हालात ऐसे हैं कि कई बार मरीजों के परिजन रक्त के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हो जाते हैं, तो कुछ लोग बिचौलियों के जाल में फंसकर खून की कीमत चुकाने पर विवश हो रहे हैं.
By PRADEEP KUMAR | Updated at :
यह स्थिति ना सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा कर रही है. बताया जा रहा है कि नियमित रक्तदान शिविरों की कमी और स्वैच्छिक रक्तदाताओं की घटती संख्या और ब्लड कैंप नहीं लगने के कारण ब्लड बैंक का स्टॉक कम हो रहा है. इसका सबसे ज्यादा असर थैलेसीमिया से ग्रसित मरीजों पर पड़ रहा है. रक्त उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में इन मरीजों की सेहत पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है. परिजनों का कहना है कि कई बार अस्पताल पहुंचने के बाद भी समय पर रक्त नहीं मिल पाता, जिससे इलाज में देरी होती है. मजबूरी में उन्हें निजी स्तर पर रक्त की व्यवस्था करनी पड़ती है. इसके एवज में उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है. यह स्थिति गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए और भी कष्टकारी बन जाती है.
जिले में हैं 165 थैलेसीमिया मरीज
जिले में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार चिंता बढ़ा रही है. सदर अस्पताल से प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार गिरिडीह जिले में कुल 165 बच्चे थैलेसीमिया से ग्रसित हैं. इसके लिए सभी मरीजों को गिरिडीह सदर अस्पताल के ब्लड बैंक पर निर्भर रहना पड़ता है. हालांकि, ब्लड बैंक में रक्त की कमी के कारण मरीजों को समय पर खून उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. स्थिति यह है कि कई बार बच्चों को निर्धारित तिथि पर ब्लड नहीं मिल पाता, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ने लगती है. मजबूरी में परिजनों को ब्लड की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ता है या फिर बिचौलियों के माध्यम से पैसे देकर ब्लड खरीदना पड़ता है. परिजनों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए हर 15 दिन में ब्लड की व्यवस्था करना बेहद कठिन हो गया है. कई मामलों में ब्लड नहीं मिलने की वजह से बच्चों को अस्पताल में भर्ती रखने के बावजूद इलाज में देरी हो रही है. कुछ परिजनों ने यह भी बताया कि कई बार ब्लड की व्यवस्था ना होने पर उन्हें लौटना भी पड़ता है.
एचआइवी जांच के लिए रांची भेजा जाता है रक्त, रिपोर्ट आने में लगता है एक दिन :
चाईबासा में हाल के दिनों में हुई घटना के बाद ब्लड ट्रांसफ्यूजन की प्रक्रिया को लेकर सतर्कता और बढ़ा दी गयी है. वर्तमान व्यवस्था के तहत मरीज को ब्लड चढ़ाने से पहले दो चरणों में जांच अनिवार्य कर दी गयी है, ताकि किसी भी प्रकार का संक्रमण मरीज तक ना पहुंचे. जानकारी के अनुसार गिरिडीह सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में लायजा जांच मशीन उपलब्ध है, जिससे ब्लड की प्रारंभिक जांच की जाती है. हालांकि, एचआइवी की पुष्टि जांच के लिए आवश्यक आईडी-नेट मशीन गिरिडीह में अब तक उपलब्ध नहीं करायी जा सकी है. इसके कारण एचआइवी जांच के लिए ब्लड सैंपल को रिम्स रांची अस्पताल भेजना पड़ता है. ब्लड सैंपल को रांची भेजने और वहां जांच प्रक्रिया पूरी होने में करीब 20 घंटे का समय लग जाता है. जांच रिपोर्ट आने के बाद ही मरीज को ब्लड चढ़ाया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में होने वाली देरी का सीधा असर गंभीर मरीजों, खासकर थैलेसीमिया, प्रसूता महिलाओं और आपातकालीन मरीजों पर पड़ रहा है, जिन्हें तत्काल ब्लड की आवश्यकता होती है.
पिछले दो महीनों से ब्लड बैंक में नहीं है खून : रमेश यादव
गिरिडीह श्रेया क्लब के सचिव रमेश यादव ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जतायी है. उन्होंने बताया कि सदर अस्पताल के ब्लड बैंक में पिछले करीब दो महीनों से लगातार ब्लड की भारी किल्लत बनी हुई है. ब्लड नहीं रहने का सबसे ज्यादा असर थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चों पर पड़ रहा है. ब्लड नहीं मिलने से मरीजों की स्थिति और गंभीर हो जाती है. श्री यादव ने बताया कि जब भी उन्हें इस तरह के किसी मरीज की सूचना मिलती है, तो श्रेया क्लब अपने स्तर से किसी तरह ब्लड की व्यवस्था करवा देता है. लेकिन, ब्लड बैंक में स्थायी कमी के कारण हर जरूरतमंद की मदद कर पाना संभव नहीं होता है. उन्होंने बताया कि थैलेसीमिया से ग्रसित सबसे छोटे बच्चों को महीने में लगभग एक यूनिट ब्लड, चार से पांच वर्ष के बच्चों को दो यूनिट ब्लड, जबकि उससे बड़े बच्चों को कम से कम चार यूनिट ब्लड प्रतिमाह की आवश्यकता होती है. इतनी बड़ी जरूरत के मुकाबले ब्लड बैंक में पर्याप्त स्टॉक नहीं होना बेहद चिंताजनक है और यदि जल्द ठोस व्यवस्था नहीं की गयी तो स्थिति और भयावह हो सकती है.
नियमित रक्तदान शिविर नहीं होने से बढ़ा संकट : डॉ सोहिल अख्तर
गिरिडीह सदर अस्पताल के ब्लड बैंक इंचार्ज डॉ सोहिल अख्तर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि नियमित रूप से ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित नहीं होने की वजह से गंभीर स्थिति पैदा हो गयी है. सामान्य दिनों में प्रतिदिन करीब 20-25 यूनिट ब्लड डोनेट किया जाता है, लेकिन यह मात्रा जिले की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. बताया कि जिन मरीजों को ब्लड की आवश्यकता होती है, वे अधिकतर अपने स्तर से ही परिजनों या परिचितों के माध्यम से रक्तदान की व्यवस्था करवाते हैं, लेकिन जब ब्लड बैंक में पहले से स्टॉक उपलब्ध नहीं रहता है, तो मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. खासकर थैलेसीमिया, प्रसूता महिलाओं और आपातकालीन मरीजों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक हो जाती है. कहा कि ब्लड की कमी को दूर करने के उद्देश्य से गुरुवार को सदर अस्पताल के ब्लड बैंक परिसर में ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित किया जा रहा है. इसके अलावा आने वाले दिनों में जिले के विभिन्न स्थानों पर भी लगातार रक्तदान शिविर लगाये जायेंगे, ताकि स्टॉक फिर से सामान्य किया जा सके. कहा कि इन कैंपों के आयोजन के बाद समस्या काफी हद तक समाप्त हो जायेगी.
चुनाव व पर्वों के कारण रुके थे रक्तदान शिविर, 14 अप्रैल से होगी शुरुआत : रेड क्रॉस
गिरिडीह रेड क्रॉस के चेयरमैन अरविंद अग्रवाल बताया कि पिछले दिनों चुनाव और पर्व-त्योहारों के कारण जिले में नियमित रूप से ब्लड डोनेशन कैंप नहीं हुए. इससे यह समस्या उत्पन्न हुई. रक्तदान शिविरों के रुकने का सीधा असर सदर अस्पताल के ब्लड बैंक के स्टॉक पर पड़ा और धीरे-धीरे स्थिति गंभीर होती चली गयी. कहा कि इस समस्या को लेकर उन्होंने मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू व जिला प्रशासन को भी अवगत कराया है, ताकि स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें. उन्होंने बताया कि 14 अप्रैल से जिले में ब्लड डोनेशन कैंप की नियमित शुरुआत की जायेगी. यह अभियान लगातार चलेगा. ताकि, ब्लड बैंक में पर्याप्त स्टॉक बना रहे और किसी भी मरीज को परेशानी न हो. उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में थैलेसीमिया से ग्रसित मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर ब्लड उपलब्ध कराया जा रहा है. ऐसे मरीजों के परिजनों से उन्होंने अपील की कि वे इस कठिन समय में धैर्य बनाए रखें, रेड क्रॉस उनकी हरसंभव मदद कर रहा है. उन्होंने जिले के सभी नर्सिंग होम, सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों और आम नागरिकों से आगे आकर रक्तदान करने की अपील की. कहा कि एक यूनिट रक्त किसी की जान बचा सकता है, इसलिए समाज के हर सक्षम व्यक्ति को इस पुनीत कार्य में भागीदारी निभानी चाहिए.