सेवा व सादगी के सामने बौने साबित हुए सियासी दिग्गज, गढ़वा ने चुना ''दौलत''

सेवा व सादगी के सामने बौने साबित हुए सियासी दिग्गज, गढ़वा ने चुना 'दौलत'

अविनाश, गढ़वा गढ़वा नगर परिषद का चुनाव परिणाम जिले की राजनीति में एक नये अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है. चुनाव भले ही तकनीकी तौर पर गैरदलीय था, लेकिन मैदान की घेराबंदी और दिग्गजों की मौजूदगी ने इसे सीधे तौर पर भाजपा और सत्ताधारी दल झामुमो के बीच प्रतिष्ठा की जंग बना दिया था. एक तरफ भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास जैसे कद्दावर चेहरे थे, तो दूसरी तरफ झामुमो के केंद्रीय महासचिव सह पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. स्थानीय स्तर पर भी भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष भानु प्रताप शाही, गढ़वा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी, सांसद बीडी राम और रामचंद्र चंद्रवंशी जैसे नेताओं की फौज उतरी हुई थी, लेकिन जनता ने इन तमाम समीकरणों को दरकिनार करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी दौलत सोनी के पक्ष में अपना फैसला सुनाया. दौलत सोनी की जीत के पीछे सबसे बड़ा कारण उनका जनता के बीच निरंतर सक्रिय रहना और सेवा भाव को माना जा रहा है. जब बड़े दल अपने संसाधनों और रसूख के दम पर मतदाताओं को गोलबंद करने में जुटे थे, तब दौलत सोनी सादगी भरे अंदाज में घर-घर जाकर लोगों से संवाद कर रहे थे. उन्होंने पिछले कई वर्षों से जनता के सुख-दुख में सहभागी बनकर जो जमीन तैयार की थी. जिस कारण भाजपा और झामुमो जैसे बड़े दलों का प्रचार तंत्र बेअसर साबित हुआ. मतदाताओं ने इस चुनाव में स्पष्ट संदेश दे दिया कि उन्हें जनता के बीच रहने वाला एक सेवक चाहिए. बगावत बना झामुमो की हार का कारण इस चुनाव में झामुमो की हार के पीछे ”अपनों” की बगावत एक बड़ी वजह बनकर उभरी. पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने संतोष केसरी को अपना समर्थन देकर मैदान में उतारा था. संतोष केसरी की पत्नी पिंकी केसरी लगातार दो बार इस पद पर काबिज रह चुकी थीं, लेकिन इस बार सीट अनारक्षित होने के बाद परिस्थितियां बदल गयीं. झामुमो से बगावत कर चुनाव लड़े मासूम खान ने इस पूरे मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया. मासूम खान ने जिस तरह से जनता का समर्थन हासिल किया, उसने सीधे तौर पर संतोष केसरी के वोट बैंक में सेंधमारी की और उनका चुनावी खेल पूरी तरह बिगाड़ दिया. कंचन को दिग्गजों को समर्थन मिला, जनता का नहीं भाजपा समर्थित प्रत्याशी कंचन जायसवाल के समर्थन में राज्य के कई बड़े नेताओं ने सभा की, लेकिन शहर की जनता का समर्थन उन्हें नहीं मिल सका. भाजपा की पूरी मशीनरी और स्थानीय विधायकों-सांसदों की मेहनत के बावजूद मतदाता निर्दलीय दौलत सोनी की ओर झुके रहे. अंततः गढ़वा नगर परिषद के इस जनादेश ने यह साबित कर दिया कि स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत संपर्क के सामने दलीय प्रतिष्ठा और बड़े नामों की चमक फीकी पड़ जाती है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Akarsh Aniket

Akarsh Aniket is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >