भवनाथपुर से विजय सिंह की रिपोर्ट
Garhwa News: आज के दौर में जहां छोटी-छोटी बातों पर लोग थाने-कचहरी का चक्कर लगाने लगते हैं, वहीं झारखंड के गढ़वा जिला के भवनाथपुर प्रखंड में एक ऐसा गांव भी है, जिसने आपसी समझदारी की अनूठी मिसाल पेश की है. आदिम जनजाति बहुलवाला लरहरा गांव अरसली उत्तरी पंचायत में पड़ता है. यहां आजादी से लेकर आज तक गांव के किसी भी विवाद में थाने में प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है. लरहरा गांव के ही मणि कोरबा व सुरेंद्र कोरबा ने कहा कि हमारे पूर्वजों के समय से ही यह नियम है कि गांव का विवाद गांव में ही सुलझे. इससे आपसी भाईचारा बना रहता है और गरीब ग्रामीणों का शोषण भी नहीं होता.
400 वर्षों से रह रही कोरबा जनजाति
चारों तरफ पहाड़ों से घिरे इस छोटे से गांव (लरहरा) में करीब 40 घर हैं. यहां की आबादी लगभग 400 है. गांव के बुजुर्ग रामपृत कोरबा, बिठल कोरबा और मुंद्रिका कोरबा बताते हैं कि उनके पूर्वज यहां करीब 400 वर्षों से रह रहे हैं. चार पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है कि यहां का कोई भी मामला गांव की दहलीज के बाहर नहीं जाएगा. ग्रामीणों का मानना है कि थाना जाने से समय और पैसा दोनों की बर्बादी होती है. इससे अच्छा है कि मामले को मिल-बैठ कर पंचायत में ही सुलझा लिया जाए.
पंचायत में ही सुलझा लिया जाता है पेचीदा मामला
तीन दिन पहले गांव में एक पेचीदा मामला सामने आया था. गांव के चार बच्चों के पिता और उसी गांव की चार बच्चों की मां (रिश्ते में चाची-भतीजा) को आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया. मामला सामाजिक मर्यादा से जुड़ा था. इसलिए तत्काल पंचायत बुलाई गई. इसी बीच महिला ने थाने में प्रताड़ना की शिकायत कर दी. जब थाने से बुलावा आया, तो पूरा गांव एकजुट होकर वहां पहुंच गया. ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कहा कि आज तक इस गांव का कोई मामला थाने में दर्ज नहीं हुआ है और न ही होगा. आखिर में पुलिस के हस्तक्षेप के बिना पंचायत ने दोनों को सख्त हिदायत और माफी के साथ मामले का निबटारा किया.
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क्या करते हैं लरहरा गांव के लोग
लरहरा गांव के लोगों का मुख्य पेशा जंगल से लकड़ी काटकर उसे भवनाथपुर और टाउनशिप में बेचना है. कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रहने के बाद भी इन ग्रामीणों की वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक अनुशासन बड़े-बड़े शहरों के लिए एक सबक है.
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