गढ़वा के डंडई सीएचसी में स्वास्थ्य सेवाएं ठप, 3 बजे के बाद अस्पताल में छा जाता है सन्नाटा

Garhwa News: गढ़वा के डंडई सीएचसी में दोपहर 3 बजे के बाद स्वास्थ्य सेवाएं ठप हो जाती हैं, जिससे करीब 80 हजार की आबादी को इलाज के लिए भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. इससे संबंधित खबर नीचे पढ़ें.

गढ़वा से रमेश विश्वकर्मा की रिपोर्ट 

Garhwa News: झारखंड के गढ़वा जिला के डंडई प्रखंड मुख्यालय स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) इन दिनों खुद ‘इलाज’ की राह देख रहा है. प्रखंड की करीब 80 हजार की आबादी और 28 गांवों की स्वास्थ्य सुरक्षा का जिम्मा उठाने वाले इस केंद्र में दोपहर 3 बजे के बाद स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो जाती हैं. स्थिति यह है कि सूरज ढलते ही अस्पताल परिसर वीरान हो जाता है और किसी भी आपात स्थिति में मरीजों को देखने वाला कोई नहीं होता है. अस्पताल में ओपीडी की सुविधा सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक ही सीमित है. इसके बाद अगर किसी की तबीयत बिगड़ती है या कोई सड़क दुर्घटना होती है, तो मरीज को प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं होता है. मजबूरन ग्रामीणों को निजी क्लीनिकों की महंगी फीस भरनी पड़ती है या फिर गांवों में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाकर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है.

ड्यूटी रोस्टर पर नजर डालें तो:

  • सोम, बुध, शुक्र, शनि – डॉ. मनोज कुमार दास
  • मंगल, गुरु – डॉ. प्रतिमा कुमारी
  • आयुष ओपीडी –  डॉ. कुमुद रंजन (प्रतिदिन)

ये सभी चिकित्सक निर्धारित समय तक तो उपलब्ध रहते हैं, लेकिन 3 बजे के बाद अस्पताल में डॉक्टरों की अनुपस्थिति क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि प्रखंड मुख्यालय का अस्पताल होने के बावजूद यहां 24 घंटे सेवा न मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है. अब देखना यह है कि प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी के आश्वासन के बाद अगले दो दिनों में रोस्टर बदलता है या डंडई की जनता को शाम होते ही स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दर-दर भटकना पड़ता रहेगा.

क्या कहते हैं प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी 

डॉ वीरेंद्र राम, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी प्रभारी चिकित्सा कहते हैं कि हम समस्या से अवगत हैं. अगले दो दिनों के भीतर 3 बजे के बाद भी डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए नया रोस्टर तैयार किया जाएगा, जिससे क्षेत्र के मरीजों को राहत मिल सके. 

क्यों है 24 घंटे सेवा जरूरी

  • आपातकालीन स्थिति – रात में प्रसव पीड़ा या दुर्घटना होने पर जिला अस्पताल की दूरी अधिक होना.
  • आर्थिक बोझ – गरीब मरीजों को निजी डॉक्टरों के पास जाने से आर्थिक नुकसान.
  • बड़ी आबादी – 28 गांवों का एकमात्र सहारा होने के कारण शाम की शिफ्ट अनिवार्य.

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By Priya Gupta

प्रिया गुप्ता प्रभात खबर के लाइफस्टाइल बीट पर 1 साल से काम कर रही हैं. यहां वे हेल्थ, फैशन और भी ट्रेंड से जुड़ी आर्टिकल लिखती हैं. ये हर लेख को दिल से लिखती है, जो पाठकों को सिर्फ जानकारी नहीं, एक एहसास पहुंचा सकें.

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