गढ़वा : खेतों में अब नहीं दिखती जौ कुल्थी व ज्वार की फसलें
पीयूष तिवारी, गढ़वा :राज्य व केंद्र दोनों सरकारों ने अलग-अलग रूप से किसानों को खाते में सीधे नकद राशि देने की घोषणा की है़ सरकार की ओर से राशि देने की घोषणा के साथ ही जिले में किसानों से फार्म जमा कराये जा रहे है़ं लेकिन सरकार की यह पहल किसानों की दयनीय स्थित कितना […]
पीयूष तिवारी, गढ़वा :राज्य व केंद्र दोनों सरकारों ने अलग-अलग रूप से किसानों को खाते में सीधे नकद राशि देने की घोषणा की है़ सरकार की ओर से राशि देने की घोषणा के साथ ही जिले में किसानों से फार्म जमा कराये जा रहे है़ं लेकिन सरकार की यह पहल किसानों की दयनीय स्थित कितना सुधार पायेगा, यह देखनेवाली बात होगी़ गढ़वा जिले में खेती गांव व कस्बे के शहरीकरण होने तथा लागत ज्यादा व उपज कम होने की वजह से गढ़वा जिले के लोग परंपरागत खेती से विमुख होते जा रहे है़ं
कृषि के जानकार बताते हुए हैं कि बीते 20 सालों में गढ़वा जिले के आधे से ज्यादा किसानों ने खेती को त्याग दिया है और इसके साथ ही समाप्त हो गयी सैकड़ों व हजारों सालों से उपजायी जा रही फसले़ं किसानों के खेत परती रह रहे हैं या उनके होनेवाली उपज काफी घट गयी है़ धान, गेहूं, मक्का, अरहर, मसूर, तिल, सरसो जैसी फसलों को छोड़ दिया जाते, तो बाकी फसलें अब गिने-चुने किसानों के खेतों में ही देखने को मिलती है़
पुराने किसानों का कहना है कि कुछ समय पहले तक गढ़वा जिले की मुख्य फसलों में जौ, कुल्थी, सांवा, मिझरी, मड़ुआ, ज्वार, बाजरा शामिल हुआ करती थी़ लेकिन अब यह फसलें जिले में देखने के लिए भी दुर्लभ हो गयी है़ इसी तरह धान की स्थानीय परंपरागत किस्में पंडी, झूना, कलमदानी, ओरी, बांकर, कनया आदि अब खेती का हिस्सा नहीं है़
बीजों के लिए पूरी तरह बाजार पर निर्भर हैं कृषक
खेती के साथ-साथ किसान अब अपने घरों में बीज रखने की परंपरा का भी त्याग कर चुके है़ं बीजों के लिए पूरी तरह से कृषक बाजार पर ही निर्भर हो गये है़ं इस वजह से खेती की लागत में दुगनी-तिगुनी वृद्धि हो गयी है़ खरीफ व रबी दोनों मौसम के लिए बीज बाजार से ही खरीद कर खेतों में डाले जाते है़ं जिले की मुख्य फसल धान कृषि विभाग के आंकड़े के अनुसार 55 हजार हेक्टेयर में की जाती है़
किसान नकदी फसलों की ओर बढ़ गये हैँ : रामकेश
इस संबंध में वंशीधरनगर के कुंभा खुर्द गांव निवासी प्रगतिशील कृषक रामकेश चौधरी ने बताया कि किसान अब नकदी फसलों की ओर बढ़ गये है़ं वैसी फसल जिसे बाजार में आसानी से बेचा जा सके़ धान का क्रय केंद्र जिले में कई स्थानों पर खुलने से इसे बेचने में आसानी होती है और नकद रुपये प्राप्त हो जाते है़ं
पुराने बीज बचाना चुनौतीपूर्ण कार्य है : प्रशांत तिवारी
इस संबंध में अटौला में एमबीए करने के बाद खेती में उतरे किसान प्रशांत तिवारी ने बताया कि पुराने बीजों को बचाना किसानों के लिए चुनौती बनी हुई है़ पुरानी फसलों की डिमांड अब बाजारों में नहीं रह गयी है़ पशुपालन व खेती कभी एक-दूसरे का पूरक हुआ करती थी़ लेकिन अब दोनों अलग-अलग हो गयी है़ं इसलिए भी कई फसलें खेती से बाहर हो गयी है़ं
समय के साथ खेती में बदलाव आया है : जिला कृषि पदाधिकारी
इस संबंध जिला कृषि पदाधिकारी लक्ष्मण उरांव ने बताया कि समय के साथ खेती में बदलाव आया है़ लेकिन लोग पुरानी परंपरागत फसलों की उपयोगिता जल्द समझेंगे और वापस लौटेंगे़ इसके लिए विभाग की ओर से प्रयास किया जा रहा है़ कृषि की लागत कम हो इसके लिए लैंप्स, पैक्स व कृषि विभाग आदि के माध्यम से बीजों का वितरण किया जाता है़ खाद भी अनुदानित दर पर उपलब्ध करायी जाती है़