दुमका : माटी से जुड़ी पारंपरिक समझ को वैज्ञानिक तकनीक से जोड़कर सफलता की नयी कहानी लिखने वाले दुमका जिले के गोपीकांदर प्रखंड अंतर्गत मधुबन गांव निवासी तसर कीटपालक शंभूनाथ देहरी को राष्ट्रीय सम्मान मिलेगा. रेशम उत्पादन और गुणवत्तायुक्त बीज निर्माण में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के अधीन केंद्रीय रेशम बोर्ड ने उन्हें ‘बेस्ट सेरीकल्चर स्टेकहोल्डर अवार्ड-2026’ के लिए चुना है.
‘प्राइवेट ग्रेन्योर’ श्रेणी में मिलेगा सम्मान
शंभूनाथ को यह सम्मान ‘प्राइवेट ग्रेन्योर’ यानी निजी बीज उत्पादक श्रेणी में दिया जाएगा. आगामी 20 सितंबर 2026 को बेंगलुरु स्थित यूएएस, जीकेवीके परिसर में केंद्रीय रेशम बोर्ड के 77वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन होगा. इसी समारोह में केंद्रीय वस्त्र मंत्री उन्हें सम्मानित करेंगे. केंद्रीय रेशम बोर्ड के संयुक्त सचिव (तकनीकी) डॉ. नरेश बाबू एन ने झारखंड के हस्तकरघा, रेशम एवं हस्तशिल्प निदेशालय को पत्र भेजकर इसकी जानकारी दी है.
वैज्ञानिक प्रशिक्षण से बदली तसर उत्पादन की दिशा
स्व. बेसगा देहरी के पुत्र 44 वर्षीय शंभूनाथ देहरी का बचपन से ही तसर के पेड़ों और रेशम के कीड़ों से जुड़ाव रहा है. पहले वे मौसमी धान और मक्के की खेती पर निर्भर थे. इससे परिवार का भरण-पोषण मुश्किल से हो पाता था. वर्ष 2007-08 में उन्होंने अमड़ापाड़ा स्थित पायलट प्रोजेक्ट सेंटर (पीपीसी), कुश्चिरा से वैज्ञानिक तसर कीटपालन का सात दिवसीय प्रशिक्षण लिया.
वर्ष 2023 में केंद्र प्रायोजित ‘सिल्क समग्र-2’ योजना के तहत उन्हें 3.08 लाख रुपये की वित्तीय सहायता के साथ माइक्रोस्कोप, मदर-मॉथ टेस्टिंग टेबल और ड्रायर कैबिनेट जैसे तकनीकी उपकरण मिले. इसके बाद उन्होंने आधुनिक ग्रेनेज भवन स्थापित कर वैज्ञानिक तरीके से तसर बीज उत्पादन शुरू किया.
सरसों तेल और प्राकृतिक गोंद से बनाया देशी स्टिकी ट्रैप
शंभूनाथ के स्थानीय नवाचार ने उनकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. तसर के कीड़ों को लाल चींटी, वास्प और रेडुविड बग जैसे शिकारी कीटों से बचाने के लिए उन्होंने पीपल और बरगद के गोंद तथा सरसों तेल के मिश्रण से सस्ता देशी ‘स्टिकी ट्रैप’ विकसित किया.
पेड़ों के तने पर लगाए जाने वाले इस प्राकृतिक लेप से शिकारी कीटों से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है. इसके अलावा वे नायलॉन नेट में रियरिंग, ब्लीचिंग-चूना विसंक्रमण और माइक्रोस्कोप से मदर-मॉथ जांच जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करते हैं. इससे पेब्रिन-मुक्त गुणवत्तायुक्त तसर बीज तैयार करने में मदद मिलती है.
सालाना 64 हजार कोकून, 22 किसानों तक पहुंच रहा बीज
शंभूनाथ पांच एकड़ वन क्षेत्र में अर्जुन और आसन के पेड़ों पर सालाना 1100 डीएफएल रोगमुक्त चकत्तों का संवर्धन करते हैं. इससे करीब 64 हजार कोकून का उत्पादन होता है. उनके ग्रेनेज में तैयार रोगमुक्त बीज आसपास के 22 किसानों तक पहुंच रहे हैं.
तसर उत्पादन से होने वाली सालाना 2.32 लाख रुपये से अधिक की आय ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदल दी है. उन्होंने पक्का मकान बनवाया, दोनों बेटों को बेहतर शिक्षा दिलायी और खेती के आधुनिक संसाधन जुटाये. संताल परगना प्रमंडल स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुके शंभूनाथ अब राष्ट्रीय सम्मान से झारखंड और संताल परगना का मान बढ़ायेंगे.
