धरोहर . गुप्तकालीन संस्कृति से जुड़ी हैं यहां की शिलाकृतियों
संताल परगना में लगभग चौथी शताब्दी से निवास करने वाली द्रविड़ मूल की घटवाल व पहाड़ियां जातियां मूल रूप से शैव परंपरा से संबद्ध रहा है. उनकी आस्था प्रतिकों, पूजनीय स्थलों में स्थापित विग्रह शिव के ही अपरूप हैं. चाहे वह वृक्ष के रूप में हो, ग्राम देवता के रूप में या फिर पूजित पत्थरों की आकृति. इन्हीं शिव उपासना स्थलों के रूप में दुमका-पाकुड़ मुख्य मार्ग पर काठीकुंड स्थित दानीनाथ मंदिर एक है.
काठीकुंड : दानीनाथ मंदिर केवल एक मंदिर प्रांगण ही नहीं, बल्कि विभिन्न धार्मिक स्थलों से प्राप्त मूर्तियों व कलाकृतियों का अदभूत खुला संग्रहालय कहा जा सकता है. मंदिर में शिवलिंग के साथ ही पार्वती, दुर्गा, गणेश,
काली की मूर्तियों के साथ ही प्राचीन तराशे हुए शिलाखंड हैं. जानकारी के मुताबिक ये शिलाकृतियां संभवतः काठीकुंड प्रखंड के गंधर्व,चौधार व अन्य पहाड़ियों में बसे टूटीनाला से एकत्र किये गये हैं. इस विषय पर काफी शोध कर चुके शिक्षक डाॅ संजीव कुमार मिश्र के अनुसार शिलाकृतियों के स्वरूप और परंपरा ऐतिहासिक मापदंडों के अनुसार गुप्तकालीन कही जा सकती है, पर इस क्षेत्र में अभी काफी शोध होना बाकी है. महाशिवरात्रि के अवसर पर सप्ताह भर चलने वाले इस मेले में जनजातीय व सामुदायिक समन्वय का अनूठा नजारा देखने को मिलता है. सावन माह में इस रास्ते से गुजरने वाले हर कावरिंयां बाबा दानीनाथ पर जर्लापण जरूर करते है. अगर पर्यटन विभाग द्वारा दानीनाथ मंदिर के विकास का भार उठाया जाता है तो काठीकुंड न केवल झारखंड के पर्यटन मानचित्र पर उभरेगा, बल्कि मंदिर प्रांगण में मौजूद शिलाकृतियों के उपयुक्त संरक्षण के साथ ही क्षेत्रीय इतिहास में गहन शोध का मार्ग भी प्रशस्त होगा.
