बाहर से दवा खरीद रहे रोगी
लाख कोशिशों के बावजूद भी स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी पर नहीं आ रही है. आज भी मरीजों को सुविधाएं नहीं मिल रही है.
दुमका : दुमका जिले के जामा प्रखंड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रांगण में चलने वाले राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय को विभागीय स्तर पर पांच-छह साल से किसी भी तरह की औषधि ही नहीं मिली है. दूसरे संसाधन तो दूर की बात है. औषधियां नहीं रहने पर मरीजों को पुरजे लिखकर डाक्टर वापस भेज देते है.
नसीहत बाजार से दवा खरीदने की दे दी जाती है. जो चिकित्सक पदस्थापित हैं, उनके लिए भी यह मजबूरी है. वे भी मानते हैं कि ऐसा करना बुरा लगता है, पर करें तो आखिर करें क्या?
महीने में लाख रुपये खर्च: इस राजकीय आर्युवेदिक औषधालय में एक चिकित्सक, एक मिश्रक एवं एक चतुर्थवर्गीय कर्मचारी पदस्थापित हैं. तीनों ही सरकारी व नियमित सेवा में हैं. ऐसे में ही महीने इनके ही वेतन में लाख रुपये सरकार खर्च करती है, पर फायदा क्या जामावासियों को मिलता है, इसका तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.
छह वर्ष से औषधालय में दवा नहीं
सवा साल में 2000 मरीज निराश लौटे
इस राजकीय आर्युवेदिक औषधालय में सवा साल में तकरीबन दो हजार मरीज बिन चिकित्सीय सुविधा के वापस लौट गये. पिछले साल यानी 2015 में तकरीबन डेढ हजार मरीज की केवल रजिस्टर में इंट्री हुई. चिकित्सक ने जांच किया और केवल पुरजा बनाकर भेज दिया. इस साल भी पहली जनवरी से अब तक 497 मरीज इसी तरह लौटने पर मजबूर हुए.
क्या कहते हैं चिकित्सक
विभागीय स्तर पर लंबे अरसे से औषधियों की आपूर्ति नहीं की गयी है. पांच-छह साल से वे यहां हैं, लेकिन कभी दवा नहीं भेजी गयी. मरीज तो हर दिन आते हैं. हम जांच भी करते हैं, पर कोई सुविधा नहीं दे पाते. बाजार से उन्हें दवाइयां खरीदनी पडती है. अभी भी बहुत से लोग आयुर्वेद पर ज्यादा भरोसा करते हैं. ऐसे लोगों को यहां आने पर निराशा होती हैं. संसाधन के अभाव में हमें भी यह लगता है कि केवल पुरजा बनाने के लिए ही हमें वेतन दिया जा रहा है.
डॉ चंद्रशेखर प्रसाद, चिकित्सक
दवाइयां रहती, तो हमलोग अपनी बेहतर सेवायें दे पाते. अभी दवाइयां नहीं रहने पर हमलोगों को अक्सर कोपभाजन का शकार बनना पडता है. चिकित्सालय है, तो यहां चिकित्सीय परामर्श के साथ-साथ दवाइयां भी मिलनी चाहिए. कई और मूलभूत संसाधन का अभाव इस केंद्र में है.
