मुर्गियों के लिए जानलेवा ''साल्मोनेला''

दुमका : कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग द्वारा संचालित रेफरल पशु चिकित्सालय दुमका में ‘जूनोटिक डिजिज ऑफ पॉल्ट्री’ विषयक एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गयी, जिसमें प्रक्षेत्र के पशु चिकित्सकों एवं कई पॉल्ट्री व्यवसासियों ने भाग लिया. कार्यशाला का उद्घाटन रांची वेटनरी कॉलेज के यूनिवर्सिटी प्रोफे सर डॉ एमके गुप्ता व क्षेत्रीय निदेशक डॉ उमेश […]

दुमका : कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग द्वारा संचालित रेफरल पशु चिकित्सालय दुमका में ‘जूनोटिक डिजिज ऑफ पॉल्ट्री’ विषयक एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गयी, जिसमें प्रक्षेत्र के पशु चिकित्सकों एवं कई पॉल्ट्री व्यवसासियों ने भाग लिया. कार्यशाला का उद्घाटन रांची वेटनरी कॉलेज के यूनिवर्सिटी प्रोफे सर डॉ एमके गुप्ता व क्षेत्रीय निदेशक डॉ उमेश कुमार गुप्ता ने संयुक्त रुप से दीप प्रज्वलित कर किया.
डॉ गुप्ता ने पक्षियों खासकर मुर्गियों एवं बतख में होने वाले विभिन्न जूनोटिक डिजिज के बारे में विस्तृत जानकारी दी. खासकर उन्होंने साल्मोनेला पुलोरम पर विस्तार से प्रकाश डाला. इसके लक्षण से रोकथाम को लेकर उन्होंने सजग रहने के लिए पशु चिकित्सकों को प्रेरित किया.
कहा कि मुर्गे-मुर्गियों में सफेद डायरिया की तरह लक्षण दिखे, तो केवल उस लक्षण से ही ईलाज नहीं शुरु किया जाना चाहिए. बल्कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर ही समस्त प्रक्रियायें अपनायी जानी चाहिए. ये ऐसी बीमारियां है, जो मुर्गी से अंडे और चूजों तक में तथा मुर्गी से दूसरे मुर्गियों में फैलती है. इसके संक्रमण का मुख्य मार्ग मौखिक या नाभि या जरदी होता है. उन्होंने बताया कि इसके प्रमुख लक्षणों में ड्रिप्रेशन, झालरदार पंख, लंगड़ापन, बंद आंखे, चहकना, हांपना तथा सफेद दस्त होना है. उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम किये जाने पर ऐसे पाल्ट्री उत्पादों में अक्सर फेफड़े, गले की दीवार, जिगर और हृदय में सफेद दाने से धब्बे या चकते, हृदय का आकार असामान्य रुप से बड़ा दिखना इस संक्रमण से प्रभावित होने की पहचान है.
डॉ गुप्ता ने कहा कि बड़ी संख्या में पाल्ट्री उत्पाद रहने पर एक आकार के ऐसे पांच-सात मुर्गियों का पोस्टमार्टम करके तथा उनके कॉमन बीमारी को देखकर ही ईलाज होना चाहिए. इससे पूर्व क्षेत्रीय निदेशक उमेश कुमार गुप्ता ने इस प्रशिक्षण का लाभ लेने तथा उसका लाभ कुक्कुटपालकों तक पहुंचाने की अपील की.
रेफरल अस्पताल के प्रभारी तथा कार्यशाला के संचालक डॉ समीर सहाय ने कहा कि झोलाछाप डाक्टरों की प्रैक्टिस इस क्षेत्र के लिए बड़ी परेशानी है. अक्सर जब पशु-पक्षी की बीमारी गंभीर हो जाती है, तब उन्हें लेकर पशु पालक सरकारी पशु चिकित्सालय पहुंचते हैं.
कार्यक्रम को सफल बनाने में एसवीओ डॉ रमण कुमार ठाकुर, डॉ मृत्युंजय कुमार सिंह, केवीके के डॉ संजय, डॉ पंकज सिन्हा, डाफ फरहत जब्बार, डॉ आसिफ अहमद, डॉ मुन्नी मरांडी, डॉ सीमा, नीरज कुमार घोष, विनोद कुमार दास, मो सिराजुल हसन आदि की भूमिका अहम रही.

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