झारखंड में ग्रामीण रोजगार की सबसे बड़ी योजना मनरेगा के क्रियान्वयन पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किये हैं. वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच योजना में 603.91 करोड़ रु की देनदारी लंबित थी.
इसमें अकुशल मजदूरों का 321.84 करोड़ रु का भुगतान और सामग्री मद के 262.28 करोड़ रु शामिल हैं. कैग के अनुसार मार्च 2025 तक ये देनदारियां पूरी तरह साफ नहीं हुई थीं.
राज्य की 80 प्रतिशत आबादी ग्रामीण और 92 प्रति क्षेत्र असिंचित
राज्य की ग्रामीण आबादी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि पर निर्भर है और खेती का 92 प्रतिशत क्षेत्र असिंचित है. ऐसे में मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता था, पर कैग ने पाया कि योजना को मांग आधारित बनाने के लिए जरूरी आधारभूत सर्वेक्षण और नीचे से ऊपर की योजना प्रक्रिया का पर्याप्त पालन नहीं हुआ.
राज्य में सर्वाधिक 80.36 करोड़ रु बकाया गिरिडीह का
कैग ने छह चयनित जिलों के अभिलेखों की जांच की. मार्च 2025 तक यहां मजदूरी, सामग्री और कर मद में कुल 218.58 करोड़ रु की देनदारी मिली. गिरिडीह 80.36 करोड़ के साथ सबसे ऊपर रहा. गढ़वा में 56.13 करोड़, गोड्डा में 30.61 करोड़, पाकुड़ में 19.28 करोड़, गुमला में 18.73 करोड़ और पूर्वी सिंहभूम में 13.47 करोड़ रु लंबित थे.
गिरिडीह में अकुशल मजदूरी की 28.94 करोड़ और सामग्री मद की 48 करोड़ रु की देनदारी थी. गढ़वा में क्रमश: 31.21 करोड़ और 23.81 करोड़ रुपये बकाया मिले.
2021-22 में 349.96 करोड़ की देनदारी
राज्य में वर्षवार आंकड़ों के अनुसार 2019-20 में कुल लंबित देनदारी 6.43 करोड़ रु थी. 2020-21 में यह 19.43 करोड़ और 2021-22 में बढ़कर 349.96 करोड़ रु हो गयी. अकेले इस वर्ष अकुशल मजदूरी की 300.63 करोड़ रु की देनदारी थी. 2022-23 में कुल बकाया 80.45 करोड़ और 2023-24 में 147.64 करोड़ रु रहा.
180 दिन तक मजदूरी भुगतान में देरी
छह जिलों में जांचे गये 480 कार्यों में से 423 के मस्टर रोल की जांच में मजदूरी भुगतान में एक दिन से 180 दिन से अधिक तक की देरी मिली. नियमानुसार 15 दिन के बाद विलंब पर प्रतिदिन 0.05 प्रतिशत की दर से मुआवजा देना था, पर किसी मजदूर को इसका भुगतान नहीं किया गया. 4,300 मस्टर रोल की जांच में 7.38 लाख रु का विलंब मुआवजा देय पाया गया.
5,308 परिवारों को समय पर नहीं मिला काम
काम मांगने के 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान है. कैग को छह जिलों में 5,308 परिवारों के ऐसे मामले मिले। इनका 5.05 लाख रु बेरोजगारी भत्ता देय था, पर सिर्फ 1.89 लाख रु का भुगतान हुआ. अप्रैल 2025 तक 3.16 लाख रु बकाया थे.
42.45 लाख मजदूरी लेन-देन अस्वीकृत
2019-24 के दौरान अकुशल मजदूरी से जुड़े 42,45,281 लेन-देन अस्वीकृत हुए. इनकी राशि 231.09 करोड़ रु थी. निष्क्रिय बैंक खाते, बैंक बदलना, गलत आइएफएससी कोड, गलत खाता और आधार लिंक नहीं होने जैसे कारण सामने आये. छह जिलों में मजदूरी के 301 लेन-देन में 3.23 लाख और सामग्री के 2,584 लेन-देन में 1.94 करोड़ रु पुनः तैयार करने के लिए लंबित मिले.
प्रस्तावित कामों में सिर्फ 27 प्रतिशत पूरे
2019-24 के दौरान राज्य में 1,02,68,484 काम प्रस्तावित हुए, पर मार्च 2024 तक सिर्फ 27,96,044 यानी 27 प्रतिशत ही पूरे हो सके. 50,21,492 काम अधूरे थे और 24 प्रतिशत शुरू ही नहीं हुए. अधूरे कामों पर 2,633 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे. छह जिलों में जांचे 480 कार्यों में जनवरी 2025 तक 139 अधूरे मिले.
योजना से रोजगार दिवस तक खामियां
कैग ने पाया कि चयनित पंचायतों में आधारभूत और घर-घर वार्षिक सर्वेक्षण नहीं हुआ. 48 पंचायतों से श्रम बजट के प्रस्ताव भी प्रखंडों को नहीं भेजे गये. 48 में 14 पंचायतों में एक भी रोजगार दिवस आयोजित नहीं हुआ.
रिपोर्ट ने मजदूरी व बेरोजगारी भत्ते के समय पर भुगतान, अभिलेखों के रखरखाव, नियमित सोशल ऑडिट, पारदर्शिता और शिकायतों के त्वरित निपटारे को मजबूत करने की सिफारिश की है.
