धनबाद : छोटी उम्र में माता-पिता या करीबी अक्सर बच्चों के हाथ में खुद ही मोबाइल थमा देते हैं. कभी खाना खिलाने के लालच में, तो कभी अपना काम पूरा करने अथवा रोने-चिल्लाने से रोकने के लिए. यह लालच धीरे-धीरे उन्हें मजा देने लगता है और वे इसके आदी हो जाते हैं. लालच से शुरू होकर आदी तक का यह सिलसिला कब एडिक्शन में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता.
यह लत बिल्कुल नशे जैसी होती है. अब तो विशेषज्ञ इसे एक प्रकार का मनोविकार कहने लगे हैं. जब बच्चा मोबाइल या टीवी से चिपके रहे, अपने दैनिक कामों से जी चुराये, पढ़ाई से लेकर सोने तक पर असर दिखने लगे और आपके लाख चाहने पर भी परिस्थितियांं अनुकूल न हों, तो चेत जायें. तुरंत किसी मनोचिकित्सक की शरण में जायें.
अब तो विशेषज्ञ भी कहने लगे हैं कि बच्चे का मानसिक और भावनात्मक रूप से ख्याल रखने तथा सुरक्षित भविष्य के लिए उनको इंटरनेट का उतना ही इस्तेमाल करने दें, जितना जरूरी है. क्योंकि इंटरनेट गेमिंग का नशा आपके घर की खुशियां छीन सकता है.
