अगले विस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर नीरज सिंह की पत्नी पूर्णिमा सिंह के चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा है. पार्टी भी चाहती है कि पूर्णिमा ही चुनाव मैदान में उतरे. इससे सहानुभूति वोट मिलने की संभावना है. पूर्णिमा के चुनाव लड़ने की दशा में सिंह मैंशन परिवार के सामने झरिया सीट को बचाने के लिए कड़ी चुनौती खड़ी होगी.
हालांकि, पिछले एक वर्ष के दौरान एक बार भी पूर्णिमा सिंह किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नजर नहीं आयी हैं. नीरज सिंह के बाद उनके अनुज अभिषेक सिंह उर्फ गुड्डू ही जनता मजदूर संघ (बच्चा गुट) का कामकाज देख रहे हैं. कांग्रेस की राजनीति में भी अभिषेक एवं उनके मौसेरे भाई हर्ष सिंह सक्रिय हैं. एक खेमा अभिषेक सिंह के भी विधानसभा चुनाव लड़ने का दावा कर रहा है. वैसे परिवार की तरफ से अब तक इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है.
रघुकुल को बनाया “पछिमहा समाज” के लिए राजनीतिक केंद्र : कोयलांचल की राजनीति में सिंह मैंशन के अलावा नीरज सिंह के नेतृत्व में रघुकुल भी बिहार व यूपी के “पछिमहा समाज” के लिए राजनीतिक केंद्र बना. सिंह मैंशन हो या रघुकुल, दोनों का जनाधार एक रहा है. नीरज सिंह की हत्या और संजीव सिंह के आरोपी होने के बाद बीते एक वर्षों से यह सवाल खड़ा है कि “पछिमहा समाज” का राजनीतिक केंद्र कौन होगा? बीती सदी के 70 के दशक में कोयलांचल की राजनीति में जब सूर्यदेव सिंह काबिज हुए, वह दौर झारखंड आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में बाहरी-भीतरी की राजनीति का भी दौर रहा. झरिया समेत पूरे धनबाद कोयलांचल और पड़ोस के बोकारो, गिरिडीह से लेकर हजारीबाग तक बाहरी-भीतरी की राजनीति को लेकर उग्र माहौल था. लोटा-सोंटा-झोंटा मार भगाओ जैसे नारे का दौर था. उस दौर में गैर झारखंडी लोगों के लिए सूर्यदेव सिंह ‘गॉड फादर’ बन कर उभरे. सूर्यदेव सिंह को बिहार व यूपी के अलावा पंजाबी, मारवाड़ी, गुजराती समाज के लोगों का भी भरपूर समर्थन मिला. बाद के वर्षों में धनबाद, बोकारो व गिरिडीह जिलों में “पछिमहा समाज” की एकमात्र बड़ी ताकत के रूप में सिंह मैंशन परिवार स्थापित हो गया. सूर्यदेव बाबू ने नाम पर “पछिमहा समाज” के लोग मरने-मारने को तैयार रहते थे. झरिया विधानसभा क्षेत्र में तो बीते चार दशक से सूर्यदेव बाबू के नाम का ही सिक्का चलता रहा. सूर्यदेव बाबू के बाद उनके द्वारा तैयार जनाधार के बूते ही उनके भाई बच्चा सिंह, उनकी पत्नी कुंती देवी या फिर उनके पुत्र संजीव सिंह विधायक बनते रहे. इसमें एक बड़ा बदलाव तब आया, जब कोयलांचल की राजनीति में नीरज सिंह सक्रिय हुए.
