मधुपुर. पाथरोल स्थित मां काली मंदिर में तीन सौ वर्षों से मां की पूजा हो रही है. करौं प्रखंड क्षेत्र में भी कई आध्यात्मिक व पौराणिक धार्मिक स्थल है, जो श्रद्धालुओं को बरबस अपनी ओर खींच लेते है, पाथरोल मां काली मंदिर इनमें एक है. जहां दीपावली में काली पूजा के लिए रविवार व सोमवार को विशेष रूप से यहां भक्त पहुंचते है. बताया जाता है कि घटवाल राजा का किवदंती इस पूरे क्षेत्र पर हुआ करता था, लेकिन किसी कारणवश इस क्षेत्र पर खितौरी समुदाय ने कब्जा कर लिया. इस समुदाय की कर वसूली प्रक्रिया से आम जनता त्रस्त हो रही थी. पाथरोल निवासी घटवाल राजा ने देवी काली की उपासना कर भगवती को प्रसन्न कर उनसे शक्ति का वरदान प्राप्त किया. युद्ध में विजय प्राप्त कर पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लिया. कालांतर में यही कथा गांव में प्रचलित है. मंदिर के प्रबंधक मृणाल कुमार सिंह बताते है कि उनके पूर्वज राजा दिग्विजय सिंह जो देवी काली के भक्तों एवं उपासक थे. जिनकी भक्ति से प्रसन्न देवी ने स्वयं अपनी प्रतिमा बंगाल के कालीघाट में प्रकट कर उनके साथ पाथरोल आने की इच्छा की. राजा ने माता के आदेश से कालीघाट से प्रतिमा पाथरोल में लाकर मंदिर बनवा कर पूरे विधि-विधान से स्थापित करवाया. यहां भोग के रूप में माता को आज भी चावल और गुड़ चढ़ाया जाता है. रात में माता को पान अर्पित किया जाता है. पूर्व में पान और चावल का चूर्ण मंदिर में बिखरा मिलता था. जिसे राजा प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे. मंदिर में वार्षिक पूजा के समय पुजारी तीन दिन तक उपवास में जाकर विधि-विधान के साथ पूजा करते है. मंदिर में काली पूजा में सैकड़ों बकरे की बलि दी जाती है. यह परंपरा प्राचीन समय से चला आ रहा है.
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