कसमार: जिनके संघर्ष और बलिदान के बाद झारखंड अलग राज्य का सपना पूरा हो पाया, कसमार प्रखंड के गर्री निवासी कैलाश रजवार का नाम भी उनमें प्रमुखता से लिया जाता है़ कैलाश रजवार को नेतृत्व की कीमत आंदोलन में अपनी शहादत तक देकर चुकानी पड़ी. कसमार तीनकोनिया के पास बाजारटांड़ में उनका स्मारक स्थल है़ प्रत्येक साल 11 सितंबर को उनका शहादत दिवस मनाया जाता है़ गर्री स्थित उनके मकान के बाहर शहीद स्थल बना है़.
सामाजिक बदलाव के अगुआ थे : कसमार के गर्री निवासी कैलाश रजवार ने गर्री, कसमार व आसपास के गांवों में लोगों को अलग राज्य के आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. लोगों की गोलबंदी में अहम भूमिका निभायी थी़ अस्सी के दशक में महाजनों एवं जमींदारों के खिलाफ आंदोलन उफान पर था. इस दौरान कसमार-गर्री के हरिजन-आदिवासियों ने भी झामुमो के नेतृत्व में संगठित होकर अपने लिए जमीन प्राप्त करने का आंदोलन शुरू किया. सबसे पहले भूपतियों की फालतू जमीन और बाद में शहर में प्रवास कर गये लोगों की जमीन पर कब्जा करना तय हुआ था़ किसानों की परती जमीन पर कब्जा करने की योजना बनी थी़ कैलाश रजवार इस आंदोलन के अगुआ थे़
भूमि संघर्ष बना निर्णायक : आंदोलन के क्रम में चार सितंबर 1981 को गांव के एक बड़े किसान की एक जमीन पर चहारदीवारी तोड़कर तीर-धनुष से लैस हरिजन-आदिवासी मजदूरों ने कब्जा कर लिया़ भूस्वामी की सूचना पर घटनास्थल पर पहुंची स्थानीय पुलिस डीएसपी बेरमो को सूचित कर बैरंग लौट गयी. इसे लेकर 17 हरिजनों पर विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ. कालांतर में सभी की गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया़ इन्हीं वारंटों को लेकर 11 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे कसमार थाना के तत्कालीन सहायक आरक्षी निरीक्षक दो सिपाहियों, चार सशस्त्र जवानों व 16 चौकीदारों के साथ गांव पहुंचे़ पुलिस दल को हरिजन टोला की ओर बढ़ता देख काम में लगीं महिलाएं और बच्चे पहले तो सहमे थे, पर गिरफ्तारी के संभावित परिणाम ने उनमें साहस पैदा किया. वे पुलिस से उलझ पड़े़ इसके बाद तो मौका मिलते ही पुलिस ने औरतों-बच्चों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दी़
बाजारटांड़ में कार्यक्रम आज : 11 सितंबर को कसमार के बाजारटांड़ में आयोजित होनेवाले कैलाश रजवार के शहादत दिवस की तैयारी झामुमो प्रखंड कमेटी ने पूरी कर ली है़ कार्यक्रम में स्थानीय विधायक योगेंद्र प्रसाद, डुमरी विधायक जगरनाथ महतो, पूर्व मंत्री जयप्रकाश भाई पटेल, झामुमो केंद्रीय महासचिव संतोष रजवार, जिलाध्यक्ष हरिलाल मांझी, बोकारो महानगर कमेटी मंटू यादव समेत अन्य लोग उपस्थित रहेंगे़ यह जानकारी प्रखंड अध्यक्ष दिलीप हेंब्रम ने दी.
कई कद्दावर नेता आ चुके हैं बाजारटांड़ : अब-तक झामुमो सुप्रीमो सह पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, झामुमो के संस्थापक विनोद बिहारी महतो, धनबाद के पूर्व सांसद एके राय, गिरिडीह के पूर्व सांसद राजकिशोर महतो एवं टेकलाल महतो, डुमरी के पूर्व विधायक शिवा महतोे, डुमरी विधायक जगरनाथ महतो, गोमिया विधायक योगेंद्र प्रसाद, पूर्व मंत्री जयप्रकाश भाई पटेल के अलावा कृष्णा मारडी, सूरज मंडल, अर्जुन महतो, जलेश्वर महतो, हारू रजवार, रूपी सोरेन, रामचंद्र केसरी जैसे कद्दावर नेता शहादत दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में शरीक हो चुके हैं.
पुलिस के उत्पात का जवाब देते हुए शहीद हुआ
गांव में पुलिस के उत्पात की सूचना मिलते ही कैलाश रजवार समेत अन्य आंदोलनकारी तीर-धनुष लेकर घटनास्थल को चल पड़े. पुलिस का सामना करने के लिए आगे बढ़े़ पहले तो हाथापाई हुई, फिर उठा-पटक भी होने लगी़ इसी बीच पुलिस ने कैलाश रजवार को गोली मार दी़ बंदूक के कुंदे से मारकर उसे बुरी तरह घायल कर दिया. कई और भी गंभीर रूप से घायल हो गये़ रूक-रूक कर गोली चलती रही़ सभी लोग अपने-अपने घरों में बंद हो गये. इस बीच पुलिस कैलाश रजवार और दो अन्य घायलों को लेकर थाना लौट गयी़ तीनों को गिरिडीह सदर अस्पताल में भरती किया गया. यहां कैलाश रजवार की मृत्यु हो गयी़ कैलाश की मौत के बाद भी पुलिस की कार्रवाई जारी रही़ इसमें 14 हरिजनों को गिरफ्तार किया गया़ इनमें बलदेव कपरदार भी थे़ घटना से लोगों में खामोशी छा गयी़ गोलीकांड की न्यायिक जांच करवाने की मांग को लेकर कोई आगे नहीं बढ़ा़ घायलों को गोली ऐसी जगह लगी थी कि उसे देख कर लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि चुन-चुन कर निशाना साधा गया था़ कैलाश रजवार के परिजनों के अनुसार, कैलाश की मौत के बाद उनका शव भी परिजनों को नहीं सौंपा गया था़ इसके बाद आंदोलन में आयी नरमी को एके राय का नेतृत्व भी गति नहीं दे पाया.
कैलाश के नक्शे कदम पर पुत्र
30 वर्ष की उम्र में कैलाश रजवार शहीद हुए थे. उनकी दो संतान है़ घटना के समय पुत्र सिकंदर कपरदार महज एक वर्ष का था एवं पुत्री गर्भ में थी़ पत्नी शांति देवी बताती हैं कि उनकी मौत के बाद परिवार पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा. उनके लिए अचानक दो बच्चों का लालन-पालन एक बड़ी जिम्मेदारी थी़ संगठन या किसी से कोई मदद नहीं मिली. पर हिम्मत नहीं टूटी. किसी तरह दोनों बच्चों को मैट्रिक तक पढ़ाया़ सिकंदर भी पिता के ही नक्शे-कदम पर चल पड़ा है. पिता की तरह वह भी जरूरतमंदों की सेवा में लगा रहता है. यही कारण है कि वर्ष 2010 के पंचायत चुनाव में वह वार्ड मेंबर बना व गर्री पंचायत का उपमुखिया बने़ दूसरे चुनाव में मुखिया चुना गया. झामुमो ने प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य भी बनाया है़
