स्थानीय नीति: झारखंड में अंतिम सर्वे का स्पष्ट डाटा नहीं, आजादी के बाद सिर्फ सिंहभूम क्षेत्र में हुआ है सर्वे

रांची: झारखंड में अंतिम सर्वे सेटलमेंट कब हुआ, इसे लेकर अभी तक स्पष्ट डाटा न तो सरकार के पास है और न ही आदिवासी संगठनों के पास. कुछ लोगों का कहना है कि अंतिम सर्वे 1932 में हुआ था. इसके बाद 1972 से 1982 तक सर्वे हुआ था, पर, इसके सवालों को लेकर आदिवासी संगठनों […]

रांची: झारखंड में अंतिम सर्वे सेटलमेंट कब हुआ, इसे लेकर अभी तक स्पष्ट डाटा न तो सरकार के पास है और न ही आदिवासी संगठनों के पास. कुछ लोगों का कहना है कि अंतिम सर्वे 1932 में हुआ था. इसके बाद 1972 से 1982 तक सर्वे हुआ था, पर, इसके सवालों को लेकर आदिवासी संगठनों में रोष था. झारखंड पार्टी के नेता एनएइ होरो के नेतृत्व में आदिवासियों ने सर्वे के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया था. जगह-जगह सर्वे टीम का विरोध किया जा रहा था. बिहार सरकार से सर्वे को रद्द करने की मांग की गयी थी.

तब 1982 में तत्कालीन बिहार सरकार ने इस सर्वे को रद्द कर दिया था. यानी छोटानागपुर क्षेत्र में 1932 का ही सर्वे प्रभावी है. आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्ष प्रेमचंद कुजूर ने बताया कि दरअसल ज्यादातर सर्वे अंगरेजों के काल में ही हुए हैं. आजादी के बाद केवल सिंहभूम क्षेत्र में ही सर्वे हुआ था.

स्थानीय नीति में तब 32 के खतियानधारी ही खतियानी
स्थानीय नीति का प्रारूप यदि लागू हो जाये, तब ऐसी स्थिति में अंतिम सर्वे सेटलमेंट को आधार माना जायेगा. जबकि अंतिम सर्वे सेटलमेंट केवल सिंहभूम इलाके में आजादी के बाद हुआ है. यह 1960-1964 के बीच हुआ है. राज्य के अन्य सभी इलाकों में 1932 से पहले ही सर्वे सेटलमेंट हुआ है. तब ऐसी स्थिति में लोगों को 1932 का खतियान दिखाने पर ही मूलनिवासी माना जायेगा.

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन की तिथि से 15 वर्ष पहले रहने वाले स्थानीय
रांची. स्थानीय नीति को लेकर झारखंड एक बार फिर चर्चा में है. कमेटी द्वारा प्रस्तावित नीति में दो अलग-अलग नीतियां बनाने की बात कही गयी है. 13 वर्ष के बाद यह पहल हो रही है. यहां खतियानी को ही स्थानीय मानने की बात हो रही है. हालांकि, अभी यह प्रस्ताव के स्टेज पर ही है. अंतिम रूप से कुछ तय नहीं हो सका है. कमेटी चाहती है कि अंतिम सर्वे को स्थानीयता का आधार बनाया जाये. पर, स्थिति यह है कि यहां के अधिकतर जिलों में अंतिम सर्वे सेटलमेंट 1932 में हुआ था. यानी इसके बाद जमीन खरीदनेवाले लोगों को स्थानीय नहीं माना जा सकता. इसे लेकर विवाद है.

दूसरी ओर झारखंड साथ ही गठित उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में बिना कोई विवाद के ही स्थानीय नीति निर्धारित कर दी गयी. वह भी राज्य गठन के तुरंत बाद. झारखंड और छत्तीसगढ़ की स्थिति कमोबेश एक ही है. दोनों ही राज्य जनजातीय बहुल इलाका है. दोनों राज्य पांचवीं अनुसूची में शामिल है, पर छत्तीसगढ़ में इसका निर्धारण हो गया, लेकिन झारखंड में आजतक स्थानीय नीति नहीं बन सकी है.

जो जन्म लिया, स्थानीय
छत्तीसगढ़ में राज्य गठन की तिथि से 15 वर्ष पूर्व रहनेवालों को स्थानीय माना गया है. इसके अलावा जो छत्तीसगढ़ में पैदा हुआ हो, उसे भी स्थानीय का दरजा दिया गया है. साथ ही राज्य में शिक्षा ग्रहण करनेवाले, राज्य या केंद्र का कर्मचारी होने पर भी स्थानीय नागरिक का दर्जा दिया गया है. साथ ही एमपी में रहते हुए कक्षा तीन से सातवीं तक पढ़ाई करनेवालों को भी स्थानीय माना गया है.

1985 आधार वर्ष बना
उत्तराखंड भी झारखंड के साथ ही अलग हुआ था. 9.11.2000 को राज्य का गठन हुआ था. इस तिथि को कट ऑफ डेट मानते हुए इससे 15 वर्ष पूर्व यानी 1985 से पहले रहनेवालों को स्थानीय माना गया है.

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