जो आदिवासियों की विकास की बात करेगा, समाज उसे ही चुनाव में समर्थन देगा: परगना

लोकसभा चुनाव में आदिवासी समाज के अस्तित्व, परंपरा, संस्कृति, जल, जंगल, जमीन व संवैधानिक अधिकार की बात करने वाले प्रत्याशी को भारी मतों से विजयी बनायेंगे. आदिवासियों की मांग पूरा नहीं करने की स्थिति में आने वाले विधानसभा चुनाव में वैसे प्रत्याशी को सबक सिखाया जायेगा.

लोबीर दोरबार में जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा ने कहा कि लोकसभा चुनाव में आदिवासी समाज के अस्तित्व, परंपरा, संस्कृति, जल, जंगल, जमीन व संवैधानिक अधिकार की बात करने वाले प्रत्याशी को भारी मतों से विजयी बनायेंगे. आदिवासियों की मांग पूरा नहीं करने की स्थिति में आने वाले विधानसभा चुनाव में वैसे प्रत्याशी को सबक सिखाया जायेगा. यह बातें परगना बाबा दशमत हांसदा ने सोमवार की देर शाम को दलमा के समीप फदलोगोड़ा में कही. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अब वोट बैंक नहीं है. आदिवासी अपने हक अधिकार लेने के लिए सक्षम हैं. आदिवासी समाज शांति और सुशासन का पक्षधर है. लेकिन अन्याय व अत्याचार को चुपचाप सह भी नहीं सकता है. वर्तमान समय में झारखंड ही नहीं पूरे देश स्तर पर आदिवासियों की स्थिति बदत्तर हो गयी है. इसके लिए कहीं न कहीं राजनीति संगठन काफी हद तक जिम्मेदार हैं. जो आदिवासियों के विकास की बात करते हैं, लेकिन धरातल ही हकीकत क्या है पूरा देश जनता है. आदिवासी पूरे देश में विकास की कीमत चूका रहे हैं. खुद अपने अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं और दूसरों का घर बसा रहे हैं. आज जितने भी औद्योगिक कंपनियां, खदान व यहां तक सड़कें भी उनकी ही जमीन पर बनी है. बावजूद इसके आदिवासी विकास के किस दरवाजे में खड़े हैं यह किसी से छुपी नहीं है. इसलिए तमाम स्वशासन व्यवस्था के प्रमुखों को महाल के फैसले से अवगत करा दिया गया है कि अब फैसले की घड़ी है. यहां वहीं राज करेगा जो यहां के भूमिपूत्रों के बारे में काम करेगा.
घर-घर शिक्षा का दीपक जलायें, अपने बच्चों को शिक्षित करें
उन्होंने कहा कि समाज में शिक्षा का दीपक जलाना है, क्योंकि शिक्षा से ही समाज में परिवर्तन संभव है. आदिवासी समाज हर परिवार अपने बच्चे को आवश्यक रूप से शिक्षित बनाये. स्वशासन व्यवस्था के अगुवा से भी अनुरोध है कि वे अपने गांव को सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से ही नहीं आर्थिक व शैक्षणिक रूप से समृद्ध व विकसित बनाने का जिम्मा अपने कंधे पर उठाये. अपने समाज के लोगों को खेतीबाड़ी के लिए प्रोत्साहित करें. साथ ही अच्छी खेतीबाड़ी के लिए उन्हें आवश्यक जानकारी भी उपलब्ध करायें. साथ ही सरकार या गैर सरकारी संस्थानों से उन्हें उचित ट्रेनिंग आदि भी दिलायें. खेतीबाड़ी से संबंधित सारा प्रबंधन करने में भी उनका सहयोग करें. उन्होंने कहा कि गांव में शैक्षणिक स्थिति क्या है. यदि कोई कमी है तो उसके कारणों को तलाश करें और दूर करें. युवाओं को अच्छी एजुकेशन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करें. व्यावसायिक शिक्षा की ओर उनका झुकाव बनायें. ताकि उन्हें रोजी-रोजगार में प्राथमिकता मिले. इसके लिए स्वशासन व्यवस्था के सहयोगी पारानिक, जोग माझी, नायके बाबा आदि का भी सहयोग लें. उनसे गांव की स्थिति पर चर्चा करें.
समाज के सर्वांगीण विकास पर हो मंथन
लोबीर दोरबार में तालसा माझी बाबा दुर्गाचरण मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज जल, जंगल, जमीन व संस्कृति को बचाने ने काफी गंभीर है. इसके लिए समाज निरंतर कार्य भी कर रहा है. स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख इसके धन्यवाद के पात्र हैं. लेकिन अब आदिवासी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए भी सबों को चिंतन-मंथन करना होगा. आज पढ़े लिखे लोग सामाजिक गतिविधियों से विमुख हो रहे हैं. वे गांव-देहात के सामाजिक कार्यों में शामिल भी नहीं होते हैं. जो चिंता का विषय बना हुआ है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक व पारंपरिक धरोहर अनपढ़ लोगों की वजह से बचा हुआ है. पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में अनपढ़ लोगों की गतिविधि ही समाज में सबसे ज्यादा है.
सामाजिक एकजुटता व अखंडता हमेशा बनी रहे
दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने कहा कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए समाज को बांटने काम करते हैं. ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है. ऐसे लोगों को चिह्नित करने की भी जरूरत है. क्योंकि ये अपने आदिवासी समाज को बेचने का काम कर रहे हैं. लेकिन इससे ज्यादा आदिवासी समाज के हर व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अपने समाज की एकता व अखंडता को किसी भी परिस्थिति में टूटने ही नहीं दे. राजनीतिक संगठनों से जुड़े लोग अक्सर इस तरह का हथकंडा अपना रहे हैं. जो हाल के कुछेक दिनों में भी देखने को मिला है. उनको भी आगाह किया जाता है कि वे राजनीतिक संगठनों से जुड़कर अपना काम धंधा करे. लेकिन समाज के गंदी राजनीतिक नहीं करे. उन्होंने कहा कि राजनीतिक कोई गंदी चीज नहीं लेकिन स्वार्थसिद्दी करने वाले लोगों ने इसको भी गंदा करने का कोई कसर नहीं छोड़ा है. गांव में सामाजिक मामलों की मीटिंग व बैठक आदि की अगुवाई राजनीतिक संगठन के नेता करने लगे हैं. यह बिलकुल ही गलत है. गांव में धर्मपिता के रूप में माझी बाबा, मानकी बाबा, मुंडा बाबा हैं. उनकी ही अगुवाई में मीटिंग या बैठक होना चाहिए. बड़े स्तर पर परगना, देश परगना व देश प्रधान हैं, वहां उनकी अगुवाई में मीटिंग व बैठक होना चाहिए. उनको सम्मान देना हम सबों का कर्तव्य है.
धर्म डाक देकर समाज के लिए मंगल कामना की
लोबीर दोरबार में धर्म डाक देकर समाज के लिए मंगल कामना किया गया. साथ यह भी यह कामना किया गया कि जो लोग समाज की उन्नति व प्रगति में बाधक बने हैं या बन रहे हैं. वैसे लोगों को प्रकृति अपने संविधान के अनुरूप सजा दे. आदिवासी समाज वन, जंगल व पर्यावरण को ही अपना देवी-देवता मानता है. उन्हें विश्वास है कि प्रकृति हर किसी को उनके कर्म के लिए अपना फैसला देती है. लोबीर दोरबार में धानो मार्डी, लिटा बानसिंह, नवीन मुर्मू, सेलाय गागराई, लालसिंह गागराई, लेदेम मुर्मू, मिथुन मुर्मू समेत अन्य लोग ने अपने विचार प्रकट किये.




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Author: Dashmat Soren

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