राघोपुर : इसे राजनीतिक विफलता कहें या कुछ और कि जिस ललित बाबू ने मिथिला ही नहीं, बल्कि बिहार को देश के मानचित्र पर नयी पहचान दिलायी, उनके सपनों को ही उचित मुकाम नहीं मिल सका. दो भागों में विभक्त मिथिला का यह इलाका यूं तो शुरुआत से ही उपेक्षित रहा है, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब पहली बार दर्द को समझा, लगा कि अच्छे दिन आनेवाले हैं.
बीत रहा साल दर साल, रेल परिचालन से अछूता है जिला
राघोपुर : इसे राजनीतिक विफलता कहें या कुछ और कि जिस ललित बाबू ने मिथिला ही नहीं, बल्कि बिहार को देश के मानचित्र पर नयी पहचान दिलायी, उनके सपनों को ही उचित मुकाम नहीं मिल सका. दो भागों में विभक्त मिथिला का यह इलाका यूं तो शुरुआत से ही उपेक्षित रहा है, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री […]

कुछ हद तक सपने साकार होते भी दिखे, जब एनएच 57 पर सड़क महासेतु के माध्यम से सुपौल के ही दो अलग-अलग हिस्सों को आपस में जोड़ दिया गया और इसके साथ ही एकीकृत मिथिला का सपना भी पूरा होता नजर आया, क्योंकि इसके साथ ही रेल पुल का निर्माण भी आरंभ हुआ था, लेकिन इस पुल पर रेलवे का परिचालन अब भी सपना ही बना हुआ है. राशि के अभाव में काम अधूरा है. सीमावर्ती जिलों में सुपौल ही एक ऐसा जिला है, जहां एक गज भी रेलवे का परिचालन किसी भी हिस्से में नहीं हो रहा है. वर्तमान रेल बजट में प्रावधान के बाद रेलवे ने ही जिले के गढ़ बरुआरी स्टेशन तक 17 मार्च तक रेलवे ट्रैक निर्माण पूरा करने का दावा किया गया है.
आम लोगों का हो रहा आर्थिक दोहन : जिले में रेलवे सेवा पूरी तरह ठप रहने के कारण आम लोगों को सफर के दौरान आर्थिक दोहन का शिकार होना पड़ रहा है. दरअसल रेल परिचालन बंद रहने के कारण जिले के विभिन्न हिस्सों में लोगों के लिए सफर का एकमात्र साधन बस तथा ऑटो ही रह गये हैं. इन वाहनों के मालिक द्वारा लोगों की मजबूरी को देखते हुए कई गुणा तक किराया वसूला जा रहा है. यहां दिलचस्प यह भी है कि कोसी के इलाके में सहरसा के बाद राघोपुर रेलवे स्टेशन से ही रेलवे को सबसे अधिक राजस्व की प्राप्ति होती थी, लेकिन मेगा ब्लॉक के बाद यहां ट्रेन परिचालन बंद है, जबकि दिसंबर 2015 से यहां रेलवे यात्री आरक्षण काउंटर भी बंद पड़ा है. लिहाजा लोगों को आरक्षण के लिए असुविधा का सामना करना पड़ रहा है.
हालांकि वर्ष 2017-18 के बजट में कोसी में रेलवे योजनाओं को लेकर विभिन्न मदों में करीब 250 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं. जिसमें सहरसा-फॉरबिसगंज ट्रैक के लिए 125 तथा निर्मली-भपटियाही लाइन के लिए 25 करोड़ रुपये शामिल हैं. ऐसे में एक बार फिर लोगों की उम्मीद जगी है, लेकिन इंतजार अभी बांकी है. क्योंकि ऐसी सौगातें कई बार घोषणा में तो आ चुकी है, जमीन पर काम न के बराबर ही दिखा है.