गम के सागर ने अर्चना की आंखों में बनाया बसेरा
सुपौल : वह हैरान है, परेशान है और उस पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा है. लेकिन उसके कंधों पर तीन बच्चों की परवरिश का बोझ है. यही कारण है कि उसके मुख से बोल तक नहीं निकलती है. पिपरा थाना क्षेत्र के राजपुर गांव में अखिलेश झा का शव पहुंचने के बाद से मृतक […]
सुपौल : वह हैरान है, परेशान है और उस पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा है. लेकिन उसके कंधों पर तीन बच्चों की परवरिश का बोझ है. यही कारण है कि उसके मुख से बोल तक नहीं निकलती है. पिपरा थाना क्षेत्र के राजपुर गांव में अखिलेश झा का शव पहुंचने के बाद से मृतक का घर व गांव की गलियां सूनी-सूनी हैं. स्थिति हरेक नजर बुझी-बुझी, हरेक दिल उदास वाली है और इस उदासी के बीच अखिलेश की पत्नी अर्चना देवी इस बात को नहीं पचा पा रही है कि एक बांस के झगड़े ने उससे उसका सुहाग ही छीन लिया है. लेकिन जब बच्चों पर नजर पड़ती है, अनायास ही उसके गम के बादल आंसू के रूप में छलक उठते हैं.
राजपुर में ऐसा सन्नाटा पसरा है कि सुई भी गिरे तो उसकी आवाज सुनी जा सकती है. लेकिन अर्चना की आवाज उसके हलख में ही मन मसोस कर रह जाती है. गौरतलब है कि गत दो जनवरी को बांस के एक झगड़े में राजपुर निवासी अखिलेश बुरी तरह घायल हो गया था. मंगलवार को इलाज के दौरान पटना के पीएमसीएच में उसकी मौत हो गयी. बुधवार को शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन अब भी कई सवाल हैं जो अखिलेश की विधवा पत्नी अर्चना और उसके तीन बच्चों में मन में हिलोर मार रहे हैं.
अब कौन उठाएगा आश्रितों का बोझ : अखिलेश की मौत के बाद वैधव्य की विपदा झेल रही मृतक की पत्नी अर्चना देवी को एक ओर पति के खोने का गम है. वही दूसरी ओर इस बात की चिंता सता रहा है कि अब तीन-तीन बच्चों की परवरिश कौन करेगा. कैसे चलेगी घर-गृहस्थी. उसकी हालत देखने के बाद आसपास के लोगों का भी कलेजा कांप जाता है. उसके चेहरे का रंग उड़ चुका है. बता दें कि मारपीट से पहले अखिलेश यह नहीं जानता था कि पत्नी का यह अंतिम सानिध्य होगा. शायद उसे इस बात की भनक भी नहीं होगी कि मौत दबे पांव उसकी प्रतीक्षा में खड़ी है. वाकई, अखिलेश की मौत के बाद उनके परिजनों की दुनिया उजड़ गयी है. एक बसा-बसाया परिवार हर पल अपने अभिभावक का इंतजार कर रहा है. पत्नी को पति के वापस लौटने का इंतजार है और बच्चों को अपने पापा का. हालांकि अर्चना जानती है कि उसका पति अब इस सांसारिक मोह-माया को त्याग परलोक सिधार चुका है, लेकिन मन मानने को राजी नहीं है कि साथ इतनी जल्दी टूट गया. बार-बार कहती है ‘जनम-जनम के साथ का वादा किया था, फिर इतनी जल्दी क्यों चले गये’. फिर कहती है ‘अब इन बच्चों को कौन संभालेगा, उसमें तो हिम्मत भी नहीं रही’.