अतिक्रमण का खेल वर्षों से स्थानीय अधिकारी के सहयोग से है जारी

सुपौल : सहरसा-फारबिसगंज रेलखंड स्थित सुपौल रेलवे स्टेशन पर अधिकारियों के आने पर ही दुकानों के पहिये घूमते हैं. हालांकि कुछ घंटों बाद पुन: वही स्थिति देखने को मिलती है. रविवार को भी समस्तीपुर रेल मंडल के डीआरएम सुधांशु शर्मा के आगमन से पूर्व स्टेशन परिसर को पूर्ण रूपेण अतिक्रमणमुक्त कराया गया था, लेकिन उनके […]

सुपौल : सहरसा-फारबिसगंज रेलखंड स्थित सुपौल रेलवे स्टेशन पर अधिकारियों के आने पर ही दुकानों के पहिये घूमते हैं. हालांकि कुछ घंटों बाद पुन: वही स्थिति देखने को मिलती है. रविवार को भी समस्तीपुर रेल मंडल के डीआरएम सुधांशु शर्मा के आगमन से पूर्व स्टेशन परिसर को पूर्ण रूपेण अतिक्रमणमुक्त कराया गया था, लेकिन उनके जाते ही एक बार फिर वही स्थिति बन गयी. दर्जनों दुकान अवैध रूप से परिसर में लगा दिया गया. इसके कारण स्टेशन परिसर पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा बरकरार हो गया है. स्थानीय रेल अधिकारियों के सहयोग से चल रहे इस खेल के कारण रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के माध्यम से यात्रा करने पहुंचने वाले यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बन कर रह गया है.

दुकान के नाम पर होती है उगाही : सुपैल रेलवे स्टेशन के बाहरी परिसर में अतिक्रमण का खेल कई वर्षों से स्थानीय अधिकारी व आरपीएफ वालों के सहयोग से जारी है. जानकारी के अनुसार अतिक्रमण की वजह से यात्रियों को होने वाली परेशानी को नजर अंदाज कर दुकान लगवाने के पीछे स्थानीय अधिकारी व आरपीएफ के जवानों के निजी स्वार्थ की पूर्ति होना बताया जा रहा है. सूत्रों की मानें तो अवैध रूप से लगाये गये दुकानों से प्रतिमाह हजारों रुपये की अवैध वसूली की जाती है. जगह के हिसाब से सभी दुकानदारों को एक निश्चित रकम आरपीएफ वालों को देनी होती है. राशि नहीं देने की स्थिति में उन्हें परिसर से बाहर कर दिया जाता है. यही वजह है कि अधिकारियों के आने पर परिसर से गायब हो चुके दुकानदार पुन: अधिकारी के जाते ही परिसर पर कब्जा जमा लेते हैं. प्रतिदिन होती है राशि की वसूली : जानकारी के अनुसार अवैध रूप से लगाये गये इन दुकानों से प्रतिदिन राशि की वसूली की जाती है, जो रेलवे के खाते में नहीं बल्कि रेल कर्मियों के पॉकेट में जाता है. इसके लिए प्रति दुकान पूर्व से रेट तय कर दिये गये हैं. एक दुकानदार ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि उसकी रेल अधिकारी व आरपीएफ वालों से नजदीकी है. इस वजह से उसे मात्र आठ सौ रुपये प्रति माह के हिसाब से देना पड़ता है. अन्य दुकानदारों के लिए जगह के हिसाब से अलग-अलग दर तय किये गये हैं. दुकानदार अपने हिसाब से प्रतिदिन या एक सप्ताह पर निर्धारित राशि का भुगतान करते हैं.

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