नयी पहल से भी बच्चों को कब तक मिल पायेगी किताब, बड़ा सवाल

सुपौल : वित्तीय वर्ष 2018-19 के तहत शिक्षण संस्थानों का नया सत्र प्रारंभ हो चुका है. नये सत्र के शुभारंभ में पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रमों की जानकारी न तो छात्रों को है और न ही अभिभावकों को. इधर बच्चों की वार्षिक मूल्यांकन परीक्षा के उपरांत विभागीय निर्देश के आलोक में विद्यालयों का संचालन में सुबह […]

सुपौल : वित्तीय वर्ष 2018-19 के तहत शिक्षण संस्थानों का नया सत्र प्रारंभ हो चुका है. नये सत्र के शुभारंभ में पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रमों की जानकारी न तो छात्रों को है और न ही अभिभावकों को. इधर बच्चों की वार्षिक मूल्यांकन परीक्षा के उपरांत विभागीय निर्देश के आलोक में विद्यालयों का संचालन में सुबह के सत्र में प्रारंभ हो चुका है. बच्चे भी विद्यालय पहुंच रहे हैं. लेकिन बच्चों के पास सरकारी स्तर से मिलने वाली पुस्तकें नहीं हैं. हालांकि सरकार के दलील को मानें तो पिछले कई वर्षों से किताब के लिए परेशान हो रहे प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को अब पुस्तक के लिए परेशानी की दौर से नहीं गुजरना होगा.

सरकार ने इसकी राह निकाल ली है. बच्चों को समय पर किताब उपलब्ध हो सके इसके लिए सरकार ने नयी नीति बनायी है. सरकार ने यह फैसला किया है कि अब बच्चों के खाते में ही किताब का पैसा दिया जायेगा. इसके लिए सभी जिलों से रिपोर्ट मांगी गयी है कि कितनी संख्या में किताबों की आवश्यकता होगी.

लगातार हो रहा प्रयोग: सरकार द्वारा शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाये जाने के लिए जहां कई योजनाओं का संचालन किया गया. वहीं समाज के भविष्य को प्राथमिक स्तर की शिक्षा नि:शुल्क प्रदान करने को लेकर शिक्षा व्यवस्था को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया. लेकिन मौलिक अधिकार का जमीनी स्तर पर कितना अनुपालन हो रहा है.
गत वर्षों की स्थिति पर गौर किया जाय तो स्वत: ही अंदाजा लगाया जा सकता है. इस बाबत कई शिक्षाविदों का कहना है कि कई वर्षों से शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाये जाने की दिशा में जितना प्रयोग किया जा रहा है. सरकार को किसी भी प्रयोग में शत प्रतिशत सफलता हासिल नहीं हो पायी है. सरकार के अधिकांश नारे जमींदोज के कगार पर है.
स्थानीय स्तर के पदाधिकारी योजना को समझने व समझाने में ही उलझे रहते हैं. इसका परिणाम है कि शिक्षक व शिक्षकेतर कर्मी अपनी- अपनी मांगों को लेकर कभी धरना-प्रदर्शन या फिर हड़ताल पर जाने की धमकी देते रहते हैं. शिक्षाविदों ने कहा कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कवायद काफी समय से की जा रही है. लेकिन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कौन प्रदान करे इस दिशा को दशा देने के लिए कभी प्रयास नहीं किया गया. ऐसे में जहां सरकारी राशि सहित मौलिक अधिकार की धज्जियां उड़ायी जा रही है. वहीं इसका सामना समाज के भविष्य को ही करना पड़ रहा है.
किताब के पैसे के लिए बच्चों का बैंक में खाता होना जरूरी, मांगी गयी सूची
नये नियम के मुताबिक किताब के पैसे का लाभ पाने के लिए बच्चों का खाता होना आवश्यक है. विभाग ने जिला शिक्षा पदाधिकारी एवं सभी जिला कार्यक्रम पदाधिकारी एसएसए को इस बाबत पत्र भेज कर नामांकित बच्चों के खाता संख्या की मांग की है. इसके लिए जिन बच्चों का खाता चालू नहीं है. उनका खाता संचालित किये जाने का भी निर्देश दिया है.
वहीं राज्य परियोजना निदेशक द्वारा भेजे गये पत्र के मुताबिक बच्चों को नि:शुल्क पाठ्य-पुस्तकों की राशि उनके खाते में उपलब्ध करायेगी, ताकि बच्चे खुले बाजार से पुस्तक खरीद कर सकें. विभागीय पत्र पर भी सवाल उठाना लाजिमी है कि नये सत्र के शुभारंभ के उपरांत इस प्रकार का आदेश जारी किया गया है. विद्यालय प्रबंधन द्वारा यह कार्य अप्रैल की शुरुआत से ही कराया जाय, तो सूची बनाने में तकरीबन तीन से चार माह का समय लग सकता है.
इसके बाद छात्रों की संख्या के अनुरूप पुस्तक छपायी जायेगी. जहां सारी प्रक्रिया पूर्ण होने में छह माह से अधिक समय गुजर जायेगा. ऐसी स्थिति में अर्द्ध वार्षिक मूल्यांकन परीक्षा छात्रों को बगैर पुस्तक लिये ही देनी पड़ सकती है.
आरटीजीएस के माध्यम से विद्यालयों में राशि भेजेगा विभाग
विभाग ने विद्यार्थियों की वर्गवार व विद्यालयवार सूची तलब की है. उसे सीआरसीसी तथा बीआरसी स्तर पर समेकित करते हुए जिला स्तर पर मंगवाने को कहा गया है, ताकि जिला राज्य से उसके आलोक में राशि की मांग कर सके. राज्य स्तर से राशि प्राप्त होने पर जिला उसे संबंधित विद्यालय को आरटीजीएस के माध्यम से भेजेगा.
इसके बाद विद्यालय द्वारा बच्चों के खाते में राशि भेजी जायेगी. विभाग के इस निर्देश पर बुद्धिजीवियों का कहना है कि नि:शुल्क शिक्षा का नाम देकर सरकार व विभाग क्या जताना चाह रहे हैं. विभाग जुगाड़ तकनीक के जरिये ही सही सबसे पहले बाजार में पुस्तक उपलब्ध कराये, ताकि अभिभावक अपने- अपने बच्चों को किसी भी तरीके से पाठ्य पुस्तक उपलब्ध करवा सकें.
बोले अधिकारी
जिले में कितने बच्चों को किताब की आवश्यकता पड़ेगी अभी इसका आकलन किया जा रहा है. इसके लिए सभी बीइओ व प्रधान को निर्देश दिया गया है. जितनी किताब की जरूरत जिले में पड़ेगी, सरकार उतनी किताब छपवा कर संबंधित जिले को उपलब्ध करायेगी.
शिव शंकर राय, डीइओ, सुपौल

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