सुपौल : जुगाड़ शब्द का तात्पर्य उन वस्तुओं या औजारों से है, जो आसानी से आसपास उपलब्ध के सामानों का उपयोग कर बनाया जा सके या फिर आम लोगों को ज्ञात सरल विधियों के उपयोग से काम बना लेना भी ‘जुगाड़’ कहलाता है.
कोसी क्षेत्र के कई भागों में बाइक या पंपिंग सेट इंजन के प्रयोग से बनी सस्ती गाड़ी ‘जुगाड़’ के नाम से जानी जाती है. इसमें डीजल इंजन का प्रयोग कर एक कामचलाऊ गाड़ी बनायी जाती है, जो गांव-कस्बों में माल ढोने, सवारियों के आवागमन इत्यादि में प्रयोग की जा रही है. जिले भर में इन दिनों व्यवसाय कार्य में जुगाड़ का उपयोग बतौर वाहन के रूप में हो रहा है. जुगाड़ वाहन भी आये दिन सड़क दुर्घटना का कारण बन रहा है. वहीं इसपर नियंत्रण के लिए कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. जुगाड़ वाहन का पंजीकरण भी नहीं होता है. फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.
यही नहीं ट्रैक्टर का पंजीकरण कृषि कार्य के लिए होता है जबकि इसका उपयोग धड़ल्ले से व्यावसायिक क्षेत्र में किया जा रहा है. अन्य वाहनों के चालकों के लाइसेंस की जांच भी होती है, लेकिन ट्रैक्टर व जुगाड़ वालों से लाइसेंस नहीं मांगते.
एमवी एक्ट में नहीं आते जुगाड़ वाहन
जिले में कृषि कार्य के लिए दर्जनों ट्रैक्टर का पंजीकरण कराया गया है. सैकड़ों जुगाड़ वाहन शहर से लेकर गांव तक सड़कों पर बिना पंजीकरण के फर्राटे भरते हैं. आरटीओ विभाग के अनुसार ट्रैक्टर का पंजीकरण कृषि कार्य के लिए किया जाता है. फिटनेस के स्थान पर इन्हें प्रति वर्ष 10 रुपया एलक्सल चार्ज जमा कराना होता है. इनके चालकों के लिए भी ड्राइविंग लाइसेंस अनिवार्य है जबकि जुगाड़ वाहन एमवी एक्ट में आते ही नहीं हैं.
ऐसे में इनके पंजीकरण का कोई प्रावधान नहीं है. ऐसे वाहनों के परिचालन पर रोक लगी हुई है. अब सवाल उठना लाजिमी है कि जुगाड़ वाहन के परिचालन पर यदि रोक है तो यह वाहन सड़क पर कैसे दौड़ रहे हैं. इसका जवाब किसी भी जिम्मेदार अधिकारी के पास नहीं है. इन वाहनों में लाइट आदि की व्यवस्था भी अच्छी नहीं होती जिसके कारण यह आये दिन सड़क दुर्घटना के कारण बनते हैं.
