क्या गिद्धों की तरह गायब हो जायेगी भूरी-स्लेटी रंग की गौरैया
सुपौल : वैज्ञानिक नाम पैसर डोमेस्टिक्स जिसे मिथिला के इलाके में बगरा, फुद्दी, बगरी, कुछ जगहों पर गौरैया कहा जाता है, क्या गिद्धों के तरह ही गायब हो जायेगा भूरी-स्लेटी रंग की गौरैया. यह चिड़िया कहां गयी, स्पष्ट कारण नजर नहीं आ रहे हैं. हालांकि फूस व खपरैल की छत वाली घर में रहने वाली […]
सुपौल : वैज्ञानिक नाम पैसर डोमेस्टिक्स जिसे मिथिला के इलाके में बगरा, फुद्दी, बगरी, कुछ जगहों पर गौरैया कहा जाता है, क्या गिद्धों के तरह ही गायब हो जायेगा भूरी-स्लेटी रंग की गौरैया. यह चिड़िया कहां गयी, स्पष्ट कारण नजर नहीं आ रहे हैं. हालांकि फूस व खपरैल की छत वाली घर में रहने वाली इस चिड़िया के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण सीमेंट की घरों को माना जा रहा है. आखिर एयरकंडीशनर घरों में कहां से रह पायेगी गौरैया. यही कारण है कि यह शहरों से विलुप्त हो रही है.
लेकिन बहुत बड़ा सवाल है कि यह मिथिला से क्यों गायब हो रही है. यहां तो पग-पग पर फूस का घर है. यहां के लोग आज भी खेत-खलिहान, आंगन में कुछ न कुछ अनाज छोड़ देते हैं.
विलुप्ति का सबसे बड़ा कारण सीमेंट की घरों को माना जा रहा है. बहेलिये इसे बगेरी बताकर लोगों के भोजन में शामिल करा देते हैं सो अलग. समय रहते इसके रक्षार्थ उचित प्रयास नहीं किये जाएंगे तो शायद आनेवाली पीढ़ी इस चिड़िया के बारे में इतिहास में ही पढ़े. पशुपालन विभाग के पदाधिकारियों से जब इस बाबत बात की गयी तो सबों ने इसके लिए ग्लोबल वार्मिंग को दोषी बताया. हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मोबाइल फोन का टावर गौरैया के लिए साक्षात मौत बनकर आया है.
क्या कहते हैं पर्यावरणविद
गौरैया पर कार्य कर रहे पर्यावरणविद् भगवान जी पाठक ने बताया कि गौरैया का मनुष्य के साथ 10 हजार साल पुराना रिश्ता है. आज भारत समेत विश्व के 50 से अधिक देश गौरैया बचाओ अभियान का हिस्सा बन चुके हैं. उन्होंने बताया कि कभी ‘कॉमन बर्ड’ में पहले पायदान पर आने वाली गौरैया की जगह क्रमश: कबूतर, कौवा और मैना अपनी जगह बना चुके हैं. गौरैया का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि यूरोप के जिन देशों में आज भी गौरैया का अस्तित्व है.
वहां के लोग खुशहाल हैं और जहां से ये गायब हो रही हैं. वहां हालात दिन-प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं. श्री पाठक ने बताया कि गैर सरकारी संगठनों के साथ सरकारी एजेंसियां गौरैया को बचाने के लिए जागरूकता अभियान से लेकर ‘वर्ल्ड स्पैरो डे’ का आयोजन कर रही हैं. लेकिन बदलते जीवनशैली व शहरीकरण ने इस पक्षी के प्रजनन पर मानो रोक सी लगा दी है. गौरैया का गायब होना मानव के लिए किसी खतरे से कम नहीं है.