कचरे के ढेर में कचरा हो रहा बचपन

सुपौल : हाथ में कॉपी कलम की जगह कचरे के ढ़ेर में भविष्य तलाशते बच्चे शिक्षा से दूर हो रहे हैं. अबोध होने की वजह से फिलहाल इन्हें कुछ भी पता नहीं है. हालांकि पढ़ने की ललक इन बच्चों में भी है. हरकु व संतोलिया ने बताया कि दोनों पढ़ना चाहते हैं, लेकिन परिवार की […]

सुपौल : हाथ में कॉपी कलम की जगह कचरे के ढ़ेर में भविष्य तलाशते बच्चे शिक्षा से दूर हो रहे हैं. अबोध होने की वजह से फिलहाल इन्हें कुछ भी पता नहीं है. हालांकि पढ़ने की ललक इन बच्चों में भी है. हरकु व संतोलिया ने बताया कि दोनों पढ़ना चाहते हैं, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति उस लायक नहीं है कि वे शिक्षा हासिल करने के लिए किसी स्कूल की ओर कदम बढ़ा सके. दोनों बच्चों ने बताया कि ड्रेस में अन्य बच्चों को स्कूल जाते देख उन्हें भी स्कूल जाने की जिज्ञासा होती है.

वे भी चाहते हैं कि पढ़-लिखकर नौकरी हासिल करे, लेकिन गरीब मां-बाप को देख उनके सारे सपने बिखर जाते हैं. प्लास्टिक बीन कर या फिर शहर के विभिन्न होटल व चाय-नाश्ते की दुकान में मजदूरी कर परिवार को दो जून की रोटी उपलब्ध कराने वाले सभी बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. हालांकि ऐसा सरकारी कागजों पर ही दिखता है. सच्चाई यह है कि शहर के लगभग सभी होटलों में बाल मजदूर काम कर रहे हैं. जिन्हें सुनहरे भविष्य की दरकार है. कई बाल श्रमिक कॉपी व किताब की जगह प्लेट व थाली धोकर अपना पेट पाल रहे है.

बाल श्रमिकों से काम लेना कानूनन जुर्म है. बाल श्रमिकों से काम लेने वालों के खिलाफ बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 एवं अन्य कानूनों के तहत कठोर कार्रवाई का प्रावधान है. बावजूद शहर एवं गांव के सभी दुकानदार बच्चों से काम लेते है. फिर भी विभाग व प्रशासन कुछ कुछ भी कर पाने में अक्षम है.

प्रशासन द्वारा बाल मजदूरी के रोकथाम के लिए ठीक ढंग से पहल नहीं करने के कारण बच्चे होटलों एवं ढ़ावों में मजदूरी के लिए पहुंच रहे हैं. सरकार ने वैसे सभी थानों, प्रशासनिक अधिकारी को ऐसे बच्चों को स्कूलों में नामांकन कराने की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन जिले के अधिकारियों पर सरकार के इस आदेश का कोई असर होता नहीं दिख रहा है.

जिले में हजारों बच्चे आज भी हैं शिक्षा से वंचित

बच्चों को नि:शुल्क व अनिवार्य स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार कई योजनाएं चला रही है. सरकार के लाख प्रयास के बावजूद आज भी जिले में हजारों बच्चे शिक्षा से वंचित है.

एक तरफ आधुनिकता के इस दौर में हम चांद पर जिंदगी की तलाश में जुटे हैं. वहीं स्कूली शिक्षा से वंचित ये बच्चे दिन भर कूड़े-कचरे के ढेर पर जिंदगी तलाशते नजर आ रहे हैं. कहने के लिये स्वच्छता अभियान को लेकर बड़े-बड़े बैनर शहर के तमाम चौक-चौराहों पर लगाये जाते हैं. सरकारी कार्यालयों के पास होर्डिंग के साथ ही सरकारी अधिकारी को भी कड़े निर्देश दिये गये हैं.

ताकि पीएम के स्वच्छ भारत मिशन का सख्ती से पालन हो. बावजूद शहर में जमा कचड़ों के ढ़ेर में चुनाई करते बच्चे सरकारी योजना पर भी सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं. कचड़े के ढ़ेर में बचपन कुछ इस तरह गुम हुआ कि शिक्षा की कौन कहे दो वक्त की रोटी के लिए कचरे के ढ़ेर पर ही जीवन की तलाश उनकी नियति बन चुकी है.

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