सीतामढ़ी विस्थापित अतिक्रमण: जिले के सुप्पी प्रखंड अंतर्गत जमला गांव के बागमती नदी के कटाव से विस्थापित हुए परिवारों के पुनर्वास का मामला चार दशकों से अटका हुआ है. विस्थापितों को बसाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा अधिग्रहित की गई कीमती भूमि पर रसूखदारों और बाहरी लोगों ने अवैध कब्जा जमा रखा है. विडंबना यह है कि जिन बेघर परिवारों के नाम पर जमीन ली गई, उन्हें एक इंच जमीन नहीं मिली. अब करीब 46 साल बाद बागमती प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता की पहल से विस्थापितों में अपने आशियाने की आस जगी है.
कटाव की त्रासदी और 53 परिवारों का लंबा इंतजार
बागमती नदी के भीषण कटाव में जमला गांव के दर्जनों परिवारों के घर-मकान और खेत-खलिहान नदी में विलीन हो गए थे:
- 1976 में पहला पुनर्वास: सरकार के निर्देश पर बागमती प्रमंडल ने बड़हरवा गांव में 7 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर 107 विस्थापितों के बीच बांटी थी.
- 1980 का अधूरा अधिग्रहण: शेष बचे 53 विस्थापित परिवारों को बसाने के लिए वर्ष 1980 में बड़हरवा में 4.22 एकड़ (384 डिसमिल) जमीन अधिग्रहित की गई.
- इंतजार में बीती पीढ़ियां: 46 वर्षों में जमीन का वितरण नहीं हुआ. बाबूलाल राय, केसरी साह, रामदयाल सिंह और खोभारी राय समेत कई बुजुर्ग अपनी जमीन मिलने की आस लिए दुनिया छोड़ गए.
अवैध पक्के मकान और खेती, सीओ को लिखा पत्र
जमला गांव के विस्थापित विकास कुमार, रामजस राय और प्रमोद साह ने बताया कि अधिग्रहित जमीन पर बाहरी व स्थानीय लोगों ने अवैध पक्के मकान और झोपड़ियां बना ली हैं. कुछ लोग इस पर धड़ल्ले से खेती कर रहे हैं. विस्थापितों की लिखित शिकायत के बाद बागमती प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता ने सुप्पी के अंचलाधिकारी (सीओ) को पत्र लिखकर बड़हरवा की 384 डिसमिल जमीन को शीघ्र अतिक्रमण मुक्त कराने का अनुरोध किया है. प्रशासन का कहना है कि अवैध कब्जा हटते ही पात्र परिवारों को भूखंड सौंप दिए जाएंगे.
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