उदासीनता. रोजाना दर्जन से ज्यादा जमा हो रहे आवेदन, विभाग मौन
कार्रवाई के बजाय नजरें घुमा चल देते हैं अिधकारी
लाइसेंस लेने के पहले ही पटाखे की बिक्री शुरू
सीतामढ़ी : दिवाली व छठ पर्व को ले शहर व ग्रामीण क्षेत्रों में पटाखे की ब्रिक्री जोरों पर है. जगह-जगह दुकानें सजी हुई है. हालांकि एक भी दुकान वैध नहीं है. प्रशासन के नाक के नीचे अवैध रूप से पटाखे की खुलेआम बिक्री की जा रही है. ऐसे दुकानों पर जिन्हें कार्रवाई करना है, वे देख कर भी नजरें मोड़ ले रहे हैं. प्रशासन के स्तर से ऐसे दुकानदारों को कम से कम 15 दिन के लिए अस्थायी लाइसेंस देने का निर्णय लिया गया है. प्रक्रिया थोड़ी जटिल होने के कारण अब तक एक भी अस्थायी लाइसेंस निर्गत नहीं किया जा सका है.
आवेदनों की भरमार : प्रशासन के हवाले से मीडिया में खबर आने के बाद पटाखा की बिक्री के लिये अस्थायी लाइसेंस लेने को समाहरणालय में आवेदन लिये जा रहे हैं. प्रतिदिन दर्जन से अधिक लोग आवेदन कर रहे हैं. यह बात अलग है कि पटाखा की दुकान खुली हुई है, पर उसका लाइसेंस अब तक नहीं दिया जा सका है. संभवत: यह पहली बार होगा कि लाइसेंस लेने के पहले ही संबंधित व्यक्ति पटाखा की बिक्री शुरू कर दिये हैं.
अब तक स्पष्ट निर्णय नहीं : गत दिन जिला प्रशासन की एक बैठक हुई थी, जिसमें शहर व जिला मुख्यालय, डुमरा में पटाखा की बिक्री के लिये स्थल का चयन किया गया था. उन्हीं स्थलों के लिये ही अस्थायी लाइसेंस देने का निर्णय लिया गया था.
बैठक में इस पर विचार नहीं किया गया था कि प्रखंडों व ग्रामीण क्षेत्रों के दुकानदार को पटाखा का लाइसेंस मिलेगा अथवा नहीं. अगर दिया जायेगा तो वे लोग किस स्थान पर पटाखा की बिक्री करेंगे. मंगलवार तक इस बिंदु पर निर्णय नहीं लिया जा सका था. हालांकि शहर व डुमरा के अलावा विभिन्न प्रखंडों के लोग पटाखा की बिक्री का अस्थायी लाइसेंस लेने के लिये आवेदन कर रहे हैं.
प्रशासन ने जारी किया था निर्देश
स्थायी लाइसेंस लेना लोगों के लिए बना टेढ़ी खीर
पटाखा की दुकान के लिये स्थायी लाइसेंस लेना काफी टेढ़ी खीर है. एक तो कोई आवेदन करना नहीं चाहता है और जो हिम्मत कर आवेदन करता है तो बाद में चल कर वह पस्त हो जाता है. प्रक्रिया जटिल होने व संबंधित अधिकारियों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के चलते लाइसेंस निर्गत होना संभव नहीं हो पाता है. शहर के कोर्ट बाजार के शैलेश कुमार अग्रवाल वर्ग 2007 में लाइसेंस को आवेदन किये थे. दो-तीन वर्षों तक दौड़ लगाये. विभिन्न विभागों से प्रमाण पत्र लेकर नहीं देने के कारण उन्हें लाइसेंस नहीं मिला. उनके बाद किसी ने भी स्थायी लाइसेंस को आवेदन ही नहीं किया.
