मूर्ति बनाते मनोज दास .
सोचा भी नहीं था कि बनेंगे मूर्तिकार
पठन-पाठन में नहीं लगता था मन
सीतामढ़ी : जिंदगी के खेल में कौन व्यक्ति कब और क्या बन जायेगा, यह वह व्यक्ति भी नहीं जानता है. कुछ ऐसा ही हुआ डुमरा प्रखंड के कुम्हरा विशुनपुर गांव के मनोज दास के के साथ. जीवन में भी कुछ ऐसा ही मोड़ आया कि वे मूर्तिकार बन गये.
बचपन में खेल-खेल में सीखी मूर्ति बनाने की कला आज उनके जीने का सहारा बन गया है. खुद की मेहनत की बदौलत व अपनी कला से कमाई कर बच्चों की पढ़ाई के साथ घर परिवार का खर्च चला रहे मनोज की चर्चा आस-पास की गांवों में होती है. शारदीय नवरात्रा के छठे दिन बुधवार को मां दुर्गा की छठे स्वरूप की पूजा-अर्चना के साथ ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी है. इधर, मूर्तिकार मनोज दास लगमा चौक पर एक पूजा स्थल पर मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप देने में लगे हुए है.
बताया, बचपन में ही स्कूल जाने के दौरान रास्ते में रूक कर रोज एक मूर्तिकार को मूर्ति बनाते ध्यान से देखा करते थे. घर पर आकर खुद से मिट्टी का खिलौना बनाने का प्रयास करते थे. तब बचपना था और मन में ऐसी बात नहीं थी कि एक दिन मूर्तिकार बन जायेंगे. उन दिनों घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी. कभी-कभी स्कूल छोड़ कर पिता के साथ मजदूरी करने भी जाना पड़ता था.
पढ़ाई में मन नहीं लगता था. बाद में चलकर बचपन में मिट्टी का खिलौना बनाने की सीख काम आयी और दशहरा व सरस्वती पूजा में प्रतिमा बनाने लगे. गांव-गांव में घुम-घुमकर छोटी-छोटी प्रतिमा बेचा करता था. अब तो यह कला उनका पेशा बन चुका है. हर वर्ष इस पेशा से करीब दो लाख की आय हो जाती है. यही कला जीने का सहारा बन गया है. बताया कि अपने बच्चों की पढ़ाई पर हर माह पांच से छह हजार रुपये खर्च करते है. ताकि उनका बच्चा एक अच्छा इनसान बन सके. शेष पैसे से घर का खर्च चलाते हुए कुछ रुपये भविष्य के लिए बचत करते है.
