विलुप्ति के कगार पर घुंसार, संक्रांति पर सालभर के लिए इकट्ठा हो जाता है अनाज

संक्राति के अवसर पर लाई बनाने की पुरानी है परंपरा, घुंसार के बिना नहीं बन सकती लाई

मुकेश पांडेय/ सुजीत कुमार, रोहतास

चाची. पहले मेरा चावल भून दो. मां को बहुत काम है. लाई बनाने में देर हो जायेगी. भईया. पहले मेरा चूड़ा भून दो. काम पर जाना है. बच्चे लाई के लिए जिद कर रहे हैं. अरे, रूको भाई… भाभी पहले मेरा चूड़ा भून दो. गुड़ गरम कर पत्नी बैठी है. आप सभी को जल्दी है. पर, भईया चूल्हा एक और हाथ भी एक. सबका बारी-बारी से ही काम होगा. रात-दिन तो घुंसार चला रहा हूं. अब कितनी जल्दी करूं. यह दृश्य मंगलवार की दोपहर शिवसागर प्रखंड के समहुता गांव में प्रमोद शर्मा के घुंसार पर नजर आया. जमीन खोद कर बनाये गये बड़े और लंबे चूल्हे पर दो कड़ाह चढ़े थे. दोनों में गरम होते-होते बालू काला पड़ गया था. सोना देवी एक ओर भूसा मिश्रित कन्ना से चूल्हे को आंच दे रही थीं. दूसरी ओर प्रमोद लगातार कड़ाहे में छोलनी चला रहा था. इस बीच बात भी करते जा रहा था कि सभी को बहुत जल्दी है. पर हाथ तो एक है. हम क्या कर सकते हैं? पहले कोई आता नहीं. सभी अपने समय से आते हैं और फिर सिर पर चढ़ जाते हैं. मेरा हाल कोई नहीं समझता. पांच दिन से लगातार घुंसार चला रहा हूं.

सप्ताहभर में वर्षभर के लिए हो जाता है अनाजमकर संक्रांति के अवसर पर ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्र में भूने हुए चावल व चूड़ा से लाई बनाने की प्राचीन परंपरा है. हालांकि, समय के साथ इसका प्रचलन बदला है. पर, ग्रामीण क्षेत्र में आज भी घुंसार का अपना जलवा बरकरार है. घुंसार संचालक प्रमोद ने बताया कि पांच किलो चावल या चूड़ा भूनने की कीमत हम दो किलो चावल लेते हैं. अगर कोई नकद में चावल-चूड़ा भूनाना चाहे, तो 10 रुपये प्रति किलो भुनाई लेते हैं. उसने बताया कि नकद शायद ही कोई देता है. मेहनताना के रूप में हमें चावल ही मिलता है. हमारा यह पारंपरिक कार्य नहीं है. पर, जरूरत के अनुरूप हम पति-पत्नी यह काम करीब पांच वर्षों से कर रहे हैं. इस काम से सप्ताह दिन में अपने परिवार के वर्ष भर के लिए चावल इकट्ठा कर लेते हैं. सरकार को इस परंपरा को जीवित रखने के लिए योजना बनानी चाहिए.

घुंसार चलाना एक कलासर्द पछुआ हवा के बीच खुले मैदान में घुंसार सभी नहीं चला सकते. यह एक कला है. चूल्हे में आंच कितनी होनी चाहिए? कब अनाज डालना है? कितना भूनना है? इसके लिए एकाग्रचित होने की जरूरत है. काम कम मिलने से घुंसार के अधिकांश चूल्हे ठंडे पड़ चुके हैं. पर, जहां हैं आज भी पूरे गांव को पारंपरिक लाई, चबेना का इंतजाम कर रहे हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Panchdev kumar

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >