जुमे पर हुआ मसजिदों में विशेष खुतबा
छपरा : रमजान के पाक महीने में जुमे के दिन की खास अहमियत है. मसजिदों में नमाजियों की तादाद में खासा इजाफा हो जाता है. वहीं इमाम व ओलेमा हजरात खास खुतबों का एहतमाम करते हैं. जामा मसजिद अहले हदीस के इमाम व खतीब मौलाना अब्दुल कादिर ने रमजान को रहमत व बरकत बताते हुए कहा कि इस माह की अजमत इसलिए भी ज्यादा है कि हिदायतों का सरचश्मा कुरआन मजीद इसी माह में मुकम्मल हुआ.
उन्होंने रमजान में कुरआन की तिलावत करने से समझने व उस पर अमल करने की तलकीन की. उन्होंने सेहरी को सुन्नत बताते हुए कहा कि इसमें अल्लाह की जानिब से बरकत है. वहीं सेहरी के लिए उठने पर फजिर की नमाज की भी तौफिक होती है. मौला मसजिद के इमाम व मोकर्रिर मौलाना जाकिर ने अपनी तकरीर में रोजा को तकवा पैदा करने वाला बताया.
उन्होंने कहा कि रोजा की हालत में इनसान अपने जज्बात व ख्वाहीशात पर काबू करना सीखता है. आंख, जीभ, कान व मस्तिष्क से बुरे विचार दूर हो जाते हैं. इसी से तकवा पैदा होता है. उन्होंने कहा कि तकवा ही वो सबब है कि कोई इनसान अल्लाह का पसंदीदा बंदा हो सकता है. जामा मसजिद बड़ा तेलपा के इमाम मौलाना रज्जबुल कादरी ने रमजान को अल्लाह की जानिब से तोहफा बताते हुए कहा कि अल्लाह अपनी रहमत के दरवाजे खोल देता है. एक नेकी का सवाब सत्तर गुणा मिलता है. इमली मुहल्ला मसजिद के इमाम व खतीब मौलाना साबिर कासमी ने अपनी तकरीर में फरमाया कि अल्लाह ने पांच फराएज में रोजा व जकात को भी शामिल किया है. उन्होंने कहा कि रोजा दरअसल जिस्म का जकात है और जकात आपकी संपत्ति का वार्षिक टैक्स है. शिया मसजिद के इमामे जुमा मौलाना सैयद मासूम रजा ने कहा कि नमाज, रोजा, हज और वे तमाम काम जिनसे अल्लाह की खुशनुदी हासिल हो, इबादत है. अल्लाह ने अपने बंदों पर कभी भी मुश्किल बोझ नहीं डाला. आसानी से इबादत का हुक्म है. गरीब व मजबूर हज को नहीं जा सकते, तो जुमे में शामिल हों. अल्लाह नियत देखता है.
